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ट्रंप जीतें या बाइडेन,भारत-अमेरिका के कारोबारी रिश्तों पर असर नहीं

21वीं सदी के पहले दो दशकों में भारत और अमेरिका के आपसी व्यापार में साढ़े सात गुना इजाफा

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ट्रंप जीतें या बाइडेन,भारत-अमेरिका के कारोबारी रिश्तों पर असर नहीं
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रिश्ते में मेच्योरिटी हो तो बदलाव के बावजूद इसमें खटास नहीं आती है. भारत-अमेरिका के रिश्तों में वो मेच्योरिटी साफ दिखती है. यही वजह है कि पिछले 20 सालों में दोनों देशों में हुए बड़े राजनीतिक बदलाव का असर आपसी व्यापारिक रिश्तों में नहीं दिखा है. 21वीं सदी के पहले दो दशकों में भारत और अमेरिका के आपसी व्यापार में साढ़े सात गुना इजाफा हुआ है. लेकिन आखिर ऐसी मेच्योरिटी कब और कैसे आई?

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दो दशकों में कितनी तेजी से बढ़ा व्यापार?

साल 2000 में भारत और अमेरिका के बीच 19 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था. इसमें भारत से अमेरिका को होने वाले एक्सपोर्ट का हिस्सा 12.6 अरब डॉलर था और वहां से आने वाला इंपोर्ट 6.5 अरब डॉलर का था. 2000 के बाद से अब तक भारत के राजनीतिक माहौल में काफी बदलाव हुआ है और हमने तीन प्रधानमंत्री देखे हैं. इसी दौरान अमेरिका में भी तीन अलग-अलग पर्सनैलिटी वाले लीडर्स ने देश की कमान संभाली है. लेकिन व्यापारिक रिश्ता लगातार मजबूत ही हो रहा है.

2018 के आंकड़ों के मुताबिक उस साल भारत ने अमेरिका को करीब 84 अरब डॉलर का सामान और अन्य सेवाएं एक्सपोर्ट कीं, जबकि इंपोर्ट का आंकड़ा करीब 59 अरब डॉलर का था. पिछले दस साल में तो ये रिश्ता और भी गहराया है.

किस सेक्टर में सबसे ज्यादा ट्रेड

2009 से 2019 के बीच अमेरिका से भारत को होने वाले एक्सपोर्ट में 109% का इजाफा हुआ. और इसी दौरान भारत से अमेरिका को होने वाले एक्सपोर्ट में शानदार 173% की बढ़ोतरी हुई. अमेरिका से होने वाले इंपोर्ट का बड़ा हिस्सा है ईंधन, कीमती मेटल्स, स्टोन, एयरक्राफ्ट और कैमिकल. अपने देश से अमेरिका को होने वाले एक्सपोर्ट के बड़े आईटम्स हैं दवा, जैम्स और ज्वैलरी और आईटी सर्विसेज. 2009 से 2019 के बीच दुनिया ने भयावह आर्थिक मंदी और अमेरिका ने ट्रंप युग देखा है. इसके बावजूद भारत-अमेरिका के कारोबारी रिश्ते लगातार मजबूत ही होते रहे हैं. मजबूती के पीछे कहीं अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की बढ़ती हैसियत तो नहीं है?

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भारतीय अमेरिकियों का बढ़ता प्रभाव

1980 में भारतीय मूल के लोगों की अमेरिका में आबादी 3.8 लाख की थी. 2010 में ये बढ़कर करीब 32 लाख हो गई. नंबर के साथ रुतबा भी काफी तेजी से बढ़ा है. फॉर्च्यून 500 कंपनियों में करीब 2 फीसदी कंपनियों के सीईओ भारतीय मूल के हैं. इनमें गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मास्टरकार्ड जैसी विश्वविजयी कंपनियां भी हैं जिनके मुखिया भारतीय मूल के ही हैं.

अनुमान है कि अमेरिका में हर 7 में से एक डॉक्टर भारतीय मूल का है. सिलिकॉन वैली में भारतीय मूल के इंजीनियर्स की तूती बोलती है और ओपिनियन पोल्स की मानें को अमेरिका की अगली उप राष्ट्रपति भारतीय मूल की कमला हैरिस हो सकती हैं.

भारतीय मूल के लोगों ने अमेरिका में ब्रांड इंडिया को काफी मजबूत और प्रभावशाली बना दिया है. यही वजह है कि राजनीतिक बयार भले ही अलग बहे, आर्थिक धाराएं चुनौतीपूर्ण हो जाए, लेकिन भारत-अमेरिका के आपसी रिश्ते लगातार मजबूत हो ही रहे हैं. कारोबारी रिश्ता उसी का तो रिफ्लेक्शन है.

अमेरिका के बढ़ते व्यापार घाटे का क्या होगा असर?

भारत के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा 2009 में करीब 8 अरब डॉलर का था जो 2019 में बढ़कर करीब 29 अरब डॉलर का हो गया. क्या यह दोनों देशों के कारोबारी रिश्ते में खटास ला सकता है? शायद नहीं. वो इसीलिए कि जिन सेक्टर्स में काम कर रही भारतीय कंपनियों के के लिए अमेरिका का बाजार काफी आकर्षक है उनमें अमेरिकी कंपनियों की भी बड़ी हिस्सेदारी है. उदाहरण के लिए भारत से अमेरिका को होने वाले एक्सपोर्ट में फार्मा प्रोडक्ट्स की एक बड़ी हिस्सेदारी है.

साथ ही देसी फार्मा सेक्टर में फाइजर, अबॉट और जॉनसन एंड जॉनसन जैसी अमेरिकी कंपनियों की बड़ी हिस्सेदारी है. मतलब ये कि अमेरिका को होने वाले फार्मा एक्सपोर्ट का फायदा अमेरिकी कंपनियों को भी हो रहा है. इसीलिए अमेरिका के साथ जो व्यापार घाटा दिखता है वो असली तस्वीर पेश नहीं करता है.

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भारत में अमेरिकी कंपनियों का बढ़ता प्रभाव

गूगल के 6,500 कर्माचारी भारत में ही काम करते हैं जो कंपनी के कुल वर्कफोर्स का 6 फीसदी है. माइक्रोसॉफ्ट भारत में पिछले 30 साल से है. फोर्ड भारत में बने छोटी कार को 40 देशों में एक्सपोर्ट करती है. एक्सॉनमोबिल का मोबिल ब्रांड लुब्रिकेंट में भारत में मार्केट लीडर है. पेप्सीको, जॉनसन एंड जॉनसन, सिटिग्रुप, कोका कोला, नाईकी, वॉलमार्ट, और अमेजॉन जैसी बड़ी अमेरिकी कंपनियां भारत के बड़े बाजार में सालों से अपनी बादशाहत कायम कर चुकी हैं. इन कंपनियों ने ब्रांड अमेरिका को भारत में स्थापित किया है और दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों को ऑटो पायलट मोड में ला दिया है.

यही वजह है कि अमेरिका में कमान रिपब्लिकन के हाथ में हो या डेमोक्रेट के और अपने देश में चाहे एनडीए की सरकार हो या यूपीए की- भारत-अमेरिका का कारोबारी रिश्ता नया रिकॉर्ड बनाता रहेगा. ट्रंप या बाइडेन के चुनाव का महत्व इस सफर में कॉमा से ज्यादा का नहीं है. 4 नवंबर को अमेरिकी चुनाव का फैसला कुछ भी हो, भारत और अमेरिका ऑल वेदर फ्रेंड्स हैं और कई सालों पर यह रिश्ता ऐसे ही रहने वाला है.

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