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एक महामारी और युद्ध के बीच: सिर पर मंडरा रहे विनाश के डर का सामना कैसे करें

कोविड महामारी से लेकर यूक्रेन-रूस युद्ध: विशेषज्ञ हमें बता रहे हैं कि डर और हताशा का कैसे सामना किया जाए.

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फिट
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एक महामारी और युद्ध के बीच: सिर पर मंडरा रहे विनाश के डर का सामना कैसे करें
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पिछले दो सालों में दुनिया को वैश्विक संकट से बहुत कम राहत मिली है.

एक अभूतपूर्व महामारी के साथ-साथ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फिलिस्तीन से लेकर अफगानिस्तान तक और अब यूक्रेन में हिंसक उथल-पुथल मची है.

मौत, बीमारी और तबाही के नजारों के बीच हर दिन परेशान करने वाली खबरों की बाढ़ डर, चिंता, निराशा और हताशा को और बढ़ा देती है.

ऐसे दौर में, जब आपके चारों ओर दुख है, और भविष्य अंधकारमय दिखता है, कोई शख्स अपनी जिंदगी में चैन की उम्मीद कैसे रख सकता है?

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असामान्य हालात असामान्य प्रतिक्रियाओं को जन्म देते हैं

ऑस्ट्रियाई न्यूरोलॉजिस्ट और होलोकॉस्ट सर्वाइवर विक्टर फ्रैंकल ने नाजी कन्सनट्रेशन कैंप में एक कैदी के रूप में बिताए वक्त पर लिखे ब्योरे की अपनी किताब मैन्स सर्च फॉर मीनिंग (Man's Search for Meaning) में इस बात के साथ कहा था.

"आपकी प्रतिक्रिया अस्वाभाविक नहीं है, असामान्य हालात में असामान्य प्रतिक्रिया सामान्य बात है" ये कहा था विक्टर फ्रैंकल ने अपनी किताब 'मैंस सर्च फॉर मीनिंग' में.


दिल्ली में थेरेपिस्ट मोहना बैद्य कहती हैं, “मेरा मतलब है कि यह युद्ध है. इस शब्द के अपने मायने हैं. असल में हमने सोचा था कि युद्ध सिर्फ इतिहास की किताबों की चीज है.”

“और यह असामान्य हालात हैं. तथ्य यह है कि आप अभी जो महसूस कर रहे हैं वह सामान्य है- मुझे लगता है कि लोगों को बार-बार भरोसा दिलाना जरूरी है.”
मोहना बैद्य

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट और फोर्टिस हेल्थकेयर में मेंटल हेल्थएंड बिहेवियरल डिपार्टमेंट की प्रमुख डॉ. कामना छिब्बर इससे सहमति जताती हैं.

अपनी भावनाओं को स्वीकार करना जरूरी है, और इसे समझना चाहिए, बातों को बढ़ा-चढ़ा कर देखने की जरूरत नहीं है.
डॉ. कामना छिब्बर, मनोवैज्ञानिक

डॉ. छिब्बर बात को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं, “वह अलग बात है कि जब आपके सामने असल में ऐसी स्थिति नहीं होती है, और आप कुछ होने की आशंका को लेकर डर महसूस कर रहे होते हैं और फिर काल्पनिक हालात के आधार पर चिंता करने लगते हैं.

लेकिन इस मामले में, हमारे सामने युद्ध की वास्तविक संभावनाओं के साथ एक वास्तविक स्थिति है. इसलिए चिंतित होना और आगे चलकर हालात के नए मोड़ लेने को लेकर संकट को समझना और फिक्र करना, मुझे लगता है, इसे स्वीकार करना बहुत जरूरी है.”

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डर, अनिश्चितता, निराशा: आप कैसे इनका सामना करेंगे?

छिब्बर कहती हैं, “यह सवाल पूछने के अलावा कि आप इसे क्यों स्वीकार कर रहे हैं, मुझे लगता है कि खुद से यह भी पूछना जरूरी है कि मैं ऐसे हालात में क्या कर सकता हूँ या क्या कर सकती हूँ.”

अलग-अलग लोगों के पास हालात का सामना करने का अलग-अलग तरीका हो सकता है, जिनसे मदद मिलती है. लेकिन यहां कुछ आम सुझाव दिए जा रहे हैं, जो हमसे बातचीत में मनोवैज्ञानिकों ने दिए.

अपनी एन्ज़ाइटी की बुनियाद वजहों को पहचानें

हैदराबाद की मनोचिकित्सक डॉ. प्रिया आर. नायर कहती हैं, “आप जैसा महसूस कर रहे हैं उसकी बुनियादी वजहों का पता लगाने की कोशिश करें. क्या ऐसा है कि कोई और बात आपको परेशान कर रही थी और उसी समय खबर आई थी?"

“अगर आप ऐसे शख्स हैं, जो एन्ज़ाइटी के शिकार हैं और यह खबर इसे और बढ़ा देती है, तो इसकी पहचान करना बहुत जरूरी है. ऐसे में प्रोफेशनल की मदद लेना बेहतर है.”
डॉ. प्रिया आर. नायर

सूचना की ओवरडोज से बचें

“ घटनाओं से अनजान न रहें, लेकिन अपने रोजमर्रा के काम और रुटीन की कीमत पर खबरों के पीछे न भागें" ये कहना है डॉ. कामना छिब्बर का.

वहीं डॉ. प्रिया आर. नायर कहती हैं, "कोशिश कीजिए कि खबरें सही माध्यम से आ रही हों और हिंसा के बारीक ब्योरे वाली तस्वीरों से परहेज करें".

जब भावनाएं उफान पर होती हैं और अनमनापन घेर लेता है, तो उस समय परेशान करने वाली खबरों की बौछार आपकी सोच से कहीं ज्यादा नुकसानदायक हो सकती है.

“ सबसे पहले पक्का करें कि खबरें सही माध्यम से आ रही हैं. दूसरे, हिंसा के बारीक ब्योरे वाले दृश्यों से बचें.”
डॉ. प्रिया आर. नायर

डॉ. नायर कहती हैं, जैसे कि कोविड खबरों की बात आती है, तो संदिग्ध आंकड़ों पर ध्यान न दें.

“एकदम से नुकसान के आंकड़े और मौतों की संख्या पर जाना सही तरीका नहीं है, इसके बजाय कुछ सकारात्मक खबरों से शुरुआत करें जैसे कि बूस्टर डोज कितनी अच्छी तरह काम कर रही है.”

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“जो लोग सीधे हिंसा के संपर्क में हैं, वे एक ऐसी हालत में पहुंच सकते हैं, जहां उन्हें नींद आने में दिक्कत होती है, या इन्हीं घटनाओं से जुड़े बुरे सपने आते हैं, या लगातार कुछ इसी किस्म के ख्याल आ सकते हैं, जो हमेशा उनके दिमाग में चल रहे हैं.”
डॉ. कामना छिब्बर

कामना छिब्बर कहती हैं, “घटनाओं की खबर रखें, लेकिन अपने रुटीन और काम की कीमत पर बार-बार वही न देखते रहें.”

दूसरों की ओर देखें (दूसरों की मदद करने पर ध्यान दें)

“दूर से लोगों के लिए कुछ करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप उनकी जिस तरह भी कर सकें, मदद करें. सही रिलीफ फंड में दान दें. सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाएं, खासकर मेडिकल कॉलेज स्टूडेंट्स के लिए. दूसरों की मदद करने से हमें सुकून मिलेगा और अपने तनाव को कम करने में भी मदद मिलेगी" कहा डॉ. प्रिया आर. नायर, मनोवैज्ञानिक ने.

डॉ. नायर के अनुसार, थोड़ी हड़बड़ी आपके फायदे के लिए अच्छी हो सकती है.

“यह हमें सतर्क करता है, और यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपने करीबियों और अपने परिवार के लिए क्या करें. आप खुद को सबसे पहले रखते हैं और अपने आस-पास के लोगों के लिए सबसे बेहतर करते हैं.”
डॉ. प्रिया आर. नायर
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जिन चीजों पर आपका वश है, उन पर ध्यान दें

“हम ऐसे हालात में हैं, जो काबू से बाहर जा चुके हैं, लेकिन यह मौका है अपनी जिंदगी के दूसरे मामलों पर भी नजर डालने का, जिनमें अनिश्चितता और डर शामिल नहीं है. वो कौन लोग हैं? आप उनके लिए कौन से काम कर सकते हैं" ऐसा कहना है मोहना बैद्य का.

बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ. छिब्बर कहती हैं, “कोशिश करें और पक्का करें कि आप अपनी जिंदगी के दूसरे सभी पहलुओं से अच्छी तरह से जुड़ें हों और आप अपनी भूमिका और जिम्मेदारियों पर ध्यान दें.”

खुद को हकीकत से जोड़ने वाले काम करें

मोहना बैद्य कहती हैं, “ट्रीटमेंट का पहला कदम खुद को शांत/स्थिर महसूस कराना होगा.”

वह आगे कहती हैं, “इसलिए, अगर आप उदास या हारा हुआ महसूस कर रहे हैं और अपने रोज के रुटीन या काम नहीं करना चाहते हैं, तो पहला कदम छोटे कामों की पहचान करना है, जो आप सक्रिय महसूस करने के लिए कर सकते हैं, और अपने शरीर, मन और दिमाग को काम करना शुरू करने का मौका दें.”

मोहना ये भी कहती हैं, “ऐसी गतिविधियां करें, जो आपको हकीकत के करीब लाती हैं. जैसे कि पार्क में जाएं और घास पर चलें, या गर्म/ठंडे पानी से शावर लें. ऐसे काम करें जो आपको मौजूदा हकीकत के करीब लाते हों.”

साहित्य का सहारा लेना

कुछ मायनों में यह स्वीकार करना भी दिलासा देता है कि हालांकि हमारे पास कुछ नहीं है, मगर दुनिया ने पहले भी ऐसे हालात का सामना किया है.

इतिहास में ऐसे ही दौर से गुजरे लोगों ने ढेर सारा साहित्य, संगीत और फिल्में दी हैं, जो उम्मीद जगाती हैं.

मोहना कहती हैं, “हमने इस मुद्दे के मर्म को छुआ है और इसके तमाम नए पहलुओं पर विचार किया है.”

वह विक्टर फ्रैंकल की मैन्स सर्च फॉर मीनिंग (Viktor Frankl's Man's Search for Meaning.) किताब पढ़ने की सलाह देती हैं.

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बातचीत! बातचीत! बातचीत!

“अगर बात नहीं करते और सिर्फ डरते रहेंगे, तो यह आपका पीछा नहीं छोड़ेगा" डॉ. प्रिया आर. नायर ने कही ये बात.

वहीं डॉ. कामना छिब्बर कहती हैं, "अपनी बात कहने से आप जान पाएंगे कि दूसरे किस तरह इससे जूझ रहे हैं और समाधान निकाल रहे हैं. यह एक तरह का भरोसा जगाने का सिस्टम होगा".

डॉ. छिब्बर कहती हैं, “बात करने से आपको यह जानने में मदद मिल सकती है कि दूसरे खुद को कैसे संभाल रहे हैं और किस तरह इसका सामना कर रहे हैं. यह एक तरह से उबरने का रास्ता भी बनाएगा.”

दिमाग में इन अनुभवों की याद बनी रहती है: घर लौटे स्टूडेंट्स के लिए मेंटल हेल्थ सपोर्ट जरूरी है

फिट से बातचीत में सभी विशेषज्ञों का कहना था कि युद्धग्रस्त यूक्रेन में फंसे सैकड़ों भारतीय स्टूडेंट्स जो धीरे-धीरे घर लौट रहे हैं, उन्हें मानसिक स्वास्थ्य सहायता की जरूरत होगी.

इसमें कोई शक नहीं है. भले ही किसी में इस समय किसी भी तरह के लक्षण नहीं दिख रहे हों, मगर उनके लिए अपने अनुभव साझा करना बहुत जरूरी है ताकि इससे उनके हालात समझ पाने और इसके जरिये उनके लिए कुछ करने में मदद मिले और पक्का किया जा सके कि बाद में कोई समस्या पैदा हो" डॉ. कामना छिब्बर ने कहा.

डॉ. नायर कहती हैं, “जो कम उम्र बच्चे युद्ध क्षेत्रों से वापस आ रहे हैं, उनमें पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (Post Traumatic Stress Disorder- PTSD) विकसित हो सकता है.”

वह कहती हैं, “जैसे ही वे वापस लौटते हैं, पहले हमें उनकी शारीरिक प्रतिक्रियाओं की जांच करनी चाहिए. सबसे पहले उनके खाने, नींद, पानी जैसी बुनियादी बातों से शुरुआत होनी चाहिए. उन्हें मौका दें, और जब वे तैयार हों तो उन्हें इसके बारे में बोलने दें. यह एकदम फौरन करने की जरूरत नहीं है.”

“यहां समय बहुत खास है. अवसाद और PTSD के लक्षणों के लिए महीनों- कम से कम 3 महीने तक उन पर नजर रखनी चाहिए. अगर 6 महीने के बाद भी उनमें इसके लक्षण दिखते हैं, तो आपको किसी स्पेशलिस्ट की मदद की जरूरत हो सकती है.”
डॉ. प्रिया आर. नायर

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