सहमे लोग,सड़कों पर सन्नाटा,अगर ये आम है,तो कश्मीर में सब ‘ठीक’ है

देखिए बिस्किट, पेट्रोल जैसी रोजमर्रा की चीजों के लिए जगह-जगह कैसे भटक रहे कश्मीरी लोग

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वीडियो एडिटर: पूर्णेन्दू प्रीतम

वीडियो प्रोड्यूसर: आस्था गुलाटी

आर्टिकल 370 हटने के चालीस दिन बाद, मैंने दिल्ली से श्रीनगर वापस घर जाने का फैसला किया. 5 अगस्त को इस ऐलान के बाद से, मेरी दुनिया उलट गई थी. मैंने अपने परिवार से कॉन्टैक्ट करने की काफी कोशिश की लेकिन नहीं कर पाया. मैंने अपने दोस्तों से मदद मांगी, जिनके परिवार कश्मीर में थे लेकिन उनके हालात भी मेरे जैसे ही थे. किसी भी अन्य कश्मीरी की तरह, मैं अपने माता-पिता की आवाज सुनने के लिए बेचैन था. आखिरकार, मैं उनसे तब मिला, जब वे मुझसे मिलने आए. फिर भी, मैं सोचता रहा कि इस समय घर पर क्या चल रहा होगा?

17 सितंबर को, मैंने दिल्ली से श्रीनगर के लिए उड़ान भरी. लैंड करने के बाद एहसास हुआ कि घर अब पहले जैसा नहीं रहा. सड़कों पर सिर्फ प्राइवेट गाड़ियां ही चल रही थी. कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं था. जिन सड़कों पर चहल-पहल रहा करती थी, वे लगभग सुनसान पड़ी थीं और कम्यूनिकेशन की हालत वैसे ही ठप पड़ी थी.

मैं अपने दोस्त से मिला, जिसके पास पोस्टपेड सिम था लेकिन उसका फोन काम नहीं कर रहा था.

“पिछले 40 दिन से यहां पर सिग्नल नहीं आ रहे हैं. मैंने अपने फोन में 2 सिम डाल रखी है एक BSNL की और एयरटेल और दोनों ही में  ‘इमरजेंसी कॉल’ लिखा आ रहा है. इंटरनेट का इस्तेमाल करना हो तो मैं कैसे कर सकता हूं? मैं जब भी वेबसाइट खोलने की कोशिश करता हूं तो ये कहता है ‘नो इंटरनेट.’

मैं लाल बाग में टूरिज्म रिसेप्शन सेंटर में एक माता-पिता से मिला, जो बेहद गुस्से में थे. उन्हें अपने बेटे के लिए टिकट बुक करने के लिए 12 किलोमीटर सफर करके आना पड़ा था, जो वो अपने घर में बैठे-बैठे आराम से कर सकते थे. लेकिन आज के कश्मीर में ये संभव नहीं है.

“अपने बच्चे  के लिए टिकट बुक करने के लिए मुझे घर से 12 किलोमीटर दूर जाना पड़ा. अगर सब पहले जैसा होता तो मैं अपने घर के सामने वाले STD से बुक कर देती. पर ऐसा नहीं है अगर यहां सबकुछ सामान्य है तो ये सब क्यों?”

बुलवार्ड रोड में, मेरे पसंदीदा कैफे के शटर नीचे खींच दिए गए थे. श्रीनगर के बीचोबीच, लाल चौक पर, दिन में सारी दुकानें बंद थीं. ये एक ऐसी जगह है जिसे श्रीनगर का दिल कहा जाता है और हर दिन यहां दुकानदारों का जमावड़ा होता है.

इतना ही नहीं. सबसे खराब बात ये रही कि किराने का सामान, दवाओं और यहां तक कि पेट्रोल जैसी रोजमर्रा की जरूरतों तक लोग नहीं पहुंच पा रहे हैं.

जिस दिन मैंने श्रीनगर लैंड किया, हम सोनवार गए. पेट्रोल पंप बंद थे, और बोतलों में पेट्रोल बेचा जा रहा था. हम कम से कम तीन पेट्रोल पंपों पर गए और उन सभी ने हमें पेट्रोल देने से इनकार कर दिया. मुझे बिस्किट खरीदने के लिए पास की दुकान के शटर पर दस्तक देनी पड़ी. कश्मीर में जिंदगी फिलहाल ऐसी है!

हर कश्मीरी के मन में डर है, वे रोजमर्रा की जरूरत मुश्किल से पूरी कर पा रहे हैं. और अगर ये सब सामान्य है तो बेशक कश्मीर में सब सामान्य है!

(सभी 'माई रिपोर्ट' ब्रांडेड स्टोरीज सिटिजन रिपोर्टर द्वारा की जाती है जिसे क्विंट प्रस्तुत करता है. हालांकि, क्विंट प्रकाशन से पहले सभी पक्षों के दावों / आरोपों की जांच करता है. रिपोर्ट और ऊपर व्यक्त विचार सिटिजन रिपोर्टर के निजी विचार हैं. इसमें क्‍व‍िंट की सहमति होना जरूरी नहीं है.)

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