सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुओं को दी जमीन, इलाहाबाद HC का फैसला क्या था?
साल 2010 में इलाहबाद हाई कोर्ट ने अयोध्या मामले पर एक अहम फैसला सुनाया था 
साल 2010 में इलाहबाद हाई कोर्ट ने अयोध्या मामले पर एक अहम फैसला सुनाया था (फोटो: क्विंट हिंदी)

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुओं को दी जमीन, इलाहाबाद HC का फैसला क्या था?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में अयोध्या की विवादित जमीन को हिंदुओं को देने का आदेश दिया है. लेकिन इसपर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या फैसला सुनाया था. साल 2010 में इलाहबाद हाई कोर्ट ने इस मामले पर एक अहम फैसला सुनाया था, जिस पर साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी. आइए जानते हैं कि क्या था वह फैसला और उस आदेश में किन-किन बातों का जिक्र किया गया था.

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तीनों पक्षों के बीच विवादित भूमि का बराबर बंटवारा

30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने 2:1 के बहुमत से अयोध्या मामले पर अपना फैसला सुनाया था और 2.77 एकड़ की विवादित भूमि को मामले के 3 मुख्य पक्षकारों- निर्मोही अखाड़ा, राम लला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया था. 3 जजों की इस बेंच में जस्टिस एसयू खान, जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस धरमवीर शर्मा शामिल थे.

2.77 एकड़ की विवादित भूमि पर तीन पक्ष करते आए हैं मालिकाना हक का दावा
2.77 एकड़ की विवादित भूमि पर तीन पक्ष करते आए हैं मालिकाना हक का दावा
(इलस्ट्रेशन- कामरान अखतर / द क्विंट)
जस्टिस खान और जस्टिस अग्रवाल के बहुमत वाले फैसले के मुताबिक, कोई भी पक्ष दस्तावेजी सबूतों के जरिए विवादित भूमि पर अपना मालिकाना हक साबित करने में सफल नहीं हुआ.  

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फैसले में जस्टिस खान ने कहा था, ''मुस्लिम यह साबित नहीं कर पाए कि जमीन बाबर से जुड़ी थी, जिसके आदेश पर मस्जिद का निर्माण हुआ था. इसी तरह हिंदू भी यह साबित नहीं कर पाए कि यहां एक मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई.'' ऐसे में बाकी दलीलों को ध्यान में रखते हुए बहुमत के फैसले में एविडेंस एक्ट की धारा 110 के तहत हिंदू और मुस्लिम पक्षों को जॉइंट पजेशन (संयुक्त स्वामित्व) दे दिया गया. इसके तहत-

  • विवादित ढांचे के मुख्य गुंबद के पास वाली जगह (जहां राम लला की मूर्तियां रखी गई थी) राम लला विराजमान को दी गई
  • राम चबूतरा और सीता रसोई वाली जगह निर्मोही अखाड़े को मिली
  • बाकी का तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया

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इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों को जॉइंट पजेशन (संयुक्त स्वामित्व) दिया गया था.
इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों को जॉइंट पजेशन (संयुक्त स्वामित्व) दिया गया था.
(इलस्ट्रेशन- कामरान अखतर / द क्विंट)

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस आदेश पर मामले के तीनों मुख्य पक्ष ही सहमत नहीं हुए और उन्होंने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी. सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ हिंदू पक्ष और मुस्लिम पक्ष की कम से कम 14 याचिकाएं दाखिल हुईं.

मध्यस्थता की कोशिश रही नाकाम

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का हल मध्यस्थता के जरिए निकालने की कोशिश भी की. हालांकि इस कोशिश के नाकाम रहने के बाद 5 जजों की संविधान बेंच ने इस मामले पर रोजाना सुनवाई शुरू की. इस बेंच में सीजेआई रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल हैं.

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