मोदी-शाह से दुष्यंत की मुलाकात, किसानों की नाराजगी से बच पाएंगे? 

चौटाला और खट्टर की सबसे बड़ी दिक्कत ‘लॉ एंड ऑर्डर’ नहीं बल्कि ‘पॉलिटिकल’ है.

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 मोदी-शाह से दुष्यंत की मुलाकात, किसानों की नाराजगी से बच पाएंगे? 

जननायक जनता पार्टी के मुखिया और हरियाणा के डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने 13 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की है. किसान कानूनों को लेकर किसानों की तरफ से जिस तरह का गुस्सा हरियाणा सरकार को झेलना पड़ रहा है, उसे लेकर ये मुलाकात काफी अहम मानी जा रही है.

चौटाला और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने 12 जनवरी को गृहमंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की थी. इस मुलाकात को लेकर दावा किया गया था कि बैठक में 'हरियाणा में लॉ एंड ऑर्डर' के मुद्दे पर चर्चा की गई.

हालांकि, बैठक के बाद चौटाला ने प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया से कहा कि 'हरियाणा सरकार पर किसी भी तरह का खतरा नहीं है और सरकार 5 साल का कार्यकाल पूरा करेगी.'

ऐसा कहा जा रहा है कि बीजेपी ने चौटाला को भरोसा दिलाया है कि सुप्रीम कोर्ट के किसान कानूनों पर रोक लगाने और कमेटी बनाने के बाद से संकट खत्म हो गया है. लेकिन असलियत में ऐसा लगता तो नहीं है.

'राजनीतिक चुनौती'

चौटाला और खट्टर की सबसे बड़ी दिक्कत 'लॉ एंड ऑर्डर' नहीं बल्कि 'पॉलिटिकल' है. अलग-अलग पार्टियों से आने वाले CM-डिप्टी CM यानी खट्टर-चौटाला को केंद्र के कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों की भारी नाराजगी झेलनी पड़ रही है.

प्रदर्शनकारी किसानों ने खट्टर के हेलीकॉप्टर को उनके ही गृह जिले करनाल में नहीं उतरने दिया था. चौटाला को भी ऐसी ही स्थिति का सामना जिंद जिले के उचाना कलां में करना पड़ा. ऐसे में दोनों ही नेताओं को प्रदर्शन की वजह से अपने-अपने कार्यक्रम रद्द करने पड़े थे. अब अपने ही गढ़ में चॉपर तक लैंड नहीं करा सकने जैसी बात दोनों के लिए बड़ी ही राजनीतिक शर्मिंदगी का सबब बनी. इससे ये भी समझा जा सकता है कि प्रदेशभर के किसानों में किस हद तक नाराजगी है. इसके अलावा दुष्यंत चौटाला को तो उचाना में खाप पंचायतों का सामाजिक बहिष्कार तक सहना पड़ा है.

अब किसान कानूनों के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन से राजनीतिक नुकसान की बात करें तो दिसंबर में हुए निकाय चुनावों में इसका सबूत मिलता है. शहरी क्षेत्रों में मजबूत समझी जाने वाली बीजेपी को सोनीपत और अंबाला जैसे क्षेत्रों में हार मिली थी. बीजेपी-जेजेपी गठबंधन ने रेवाड़ी जिले का धारूहेड़ा, रोहतक का सांपला और हिसार का उलकाना भी गंवा दिया.

साफ है कि जिस बीजेपी को 2019 के विधानसभा चुनाव में एंटी-बीजेपी जाट वोटरों के एक साथ आ जाने का फायदा मिला था, उसे अब बीजेपी के साथ आ जाने के बाद नुकसान का सामना करना पड़ा रहा है. साथ ही किसान कानूनों के खिलाफ हरियाणा में चल रहे प्रदर्शनों का खामियाजा भी जेजेपी भुगत रही है.

'नंबर गेम'

दुष्यंत चौटाला का दावा कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी, ये इस मायने में अहम है क्योंकि कांग्रेस आगामी विधानसभा सत्र में 'नो कॉन्फिडेंस मोशन' लाने वाली है. अभी जो समीकरण हैं उसके मुताबिक, 90 सीटों वाली हरियाणा विधानसभा में बीजेपी के पास 40 विधायक हैं वहीं जेजेपी के पास 10. इस गठबंधन को कछ निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन है. फिलहाल, ये साफ नहीं है कि JJP के कितने विधायक बगावत करने जा रहे हैं, ऐसा अनुमान जरूर लगाया जा रहा है कि इनकी संख्या 6 या 7 हो सकी है.

अगर संकेतों को देखें तो नरनौंद विधायक राम कुमार गौतम पहले से ही किसान कानूनों के खिलाफ मुखर हैं और पार्टी के स्टैंड का विरोध कर रहे हैं. राम कुमार गौत और गुहला से विधायक ईश्वर सिंह दोनों ने ही इस हफ्ते चौटाला की तरफ से बुलाई गई बैठक में हिस्सा नहीं लिया. कांग्रेस को खट्टर सरकार गिराने के लिए कुछ और बागी जेजेपी विधायकों की जरूरत होगी.

खट्टर-चौटाला के लिए फिलहाल जो तात्कालिक चुनौती है वो है किसानों की तरफ से गणतंत्र दिवस के दिन प्रस्तावित 'ट्रैक्टर परेड'. जबकि खट्टर का कहना है "ऐसा कुछ नहीं होगा", अब किसानों के विरोध प्रदर्शन पर अगर सख्त कार्रवाई होती है तो उसके सियासी नतीजे तो निकलेंगे साथ ही जेजेपी के लिए स्थिति और कठिन हो सकती है.

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