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वाराणसी: काशी को क्योटो बनाने का था वादा, फिर इसे किसने डुबाया?

Varanasi की दुर्गति पर वहां के आम लोगों और एक्सपर्ट से बातचीत के आधार पर विस्तृत रिपोर्ट

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राज्य
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वाराणसी: काशी को क्योटो बनाने का था वादा, फिर इसे किसने डुबाया?
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काशी (Kashi) को जापान के क्योटो शहर की तरह स्मार्ट बनाए जाने का पीएम मोदी (Pm Modi) का सपना 7 साल बाद भी अधूरा दिख रहा है. अभी हाल ही में हुई कुछ घंटों की बारिश ने काशी की सड़कों को नदी बना दिया था. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि 7 साल में वाराणसी (Varanasi) की सड़कों और वाराणसी का विकास कितना हुआ? क्विंट ने इसकी तह तक जाने की कोशिश की. हमने वाराणसी के आम आदमी और एक्सपर्ट दोनों से बात की.

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मैदागिन बनारस

(फोटो: क्विंट हिंदी)

2014 में पीएम मोदी ने वाराणसी के लोगों से एक वादा किया था. उन्होंने कहा था कि वाराणसी शहर को जापान के क्योटो तीर्थस्थल जैसा बनाएंगे. जब पीएम मोदी जापान के दौरे पर गए थे तो क्योटो-वाराणसी पार्टनर सिटी एग्रीमेंट की नींव रखी गई थी.
जापान दौरे पर गए पीएम मोदी करीब एक हजार मंदिरों वाले क्योटो शहर से काफी प्रभावित हुए थे, भारत वापस आकर वाराणसी की जनता से वादा किया कि उनका शहर क्योटो जैसा खूबसूरत हो जाएगा. तब से लेकर अब तक वाराणसी के लोगों की आंखें उस क्योटो को देखने के लिए तरस गई हैं, जिसका वादा पीएम ने किया था. खैर 2021 तक वाराणसी क्योटो नहीं बन सका लेकिन जून में हुई पहली बारिश में बनारस की गालियां टापू जरूर बन गईं. बनारस की पुरानी एतिहासिक सड़कों और गालियों में बारिश के बाद पानी भर गया.
अब इस पानी ने आग काम किया है. सवालों की गर्मी है. और जवाब की तलाश. सवाल है कि अखिर 7 सालों में बनारस का कितना और कैसा विकास हुआ?
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इस बारे मे जब क्विंट ने वाराणसी में जल प्रबंधन पर रिसर्च कर रहे बीएचयू के पूर्व कार्यकारी अभियंता (यूडब्ल्यूडी), यू के बनर्जी से बात की तो उन्होंने बताया, "वाराणसी लगभग 5000 साल पुराना शहर है. शहर ने अब अपने हरित और प्राकृतिक क्षेत्रों को खो दिया है."

बनर्जी कहते हैं,

वाराणसी में शहर का ज्यादातर हिस्सा अब पक्का हो गया है. पुराने नाले पर्याप्त नहीं हैं. यहां शायद ही कोई रूफ वाटर रीयूज प्लान है. स्मार्ट सिटी योजना में जल प्रबंधन की योजना न तो व्यापक है और न ही प्रचारित. बस यही कहेंगे कि वाराणसी 17 जून 2021 को हुई बारिश जैसा मंजर दुबारा न देखे."

वाराणसी के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अनिल कुमार उपाध्याय से बातचीत की तो उन्होंने कहा,

"1975 से लगातार मैं बनारस में रह रहा हूं. मुझे याद है कि 80 के दशक में भी इतना जल भराव नहीं होता था क्योंकि बनारस का पुराना ढांचा था वो बहुत अच्छा था. ब्रिटिश गवर्नमेंट के समय ही नाला बना था और जल निकासी की उचित व्यवस्था थी. जब 1857 के विद्रोह में दिल्ली की जनसंख्या 60 हजार थी तब बनारस की 1 लाख 80 हजार थी."

बीएचयू गेट

(फोटो: क्विंट हिंदी)

प्रोफेसर अनिल कुमार उपाध्याय वाराणसी के ही रहने वाले हैं, वो कहते हैं,

"मोदी जी जब बनारस पहली बार आए थे तो उन्होंने कहा था कि बाबा विश्वनाथ का दम घुट रहा है. हम उनको आजाद करेंगे, चौड़ी सड़कें बनाएंगे. सवाल ये है कि जो काशी की गालियों में रहते हैं उनका दम नहीं घुटता है? मेरा मानना है उनका अपना एक कल्चर है, अपनी संस्कृति है ये आध्यात्मिक सिटी है, केवल धर्मिक सिटी नहीं है."
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बीएचयू हॉस्पिटल

(फोटो: क्विंट हिंदी)

धनंजय कहते हैं,

"रोड, स्ट्रीट लाइट, नदी, घाट, विश्वनाथ कॉरिडोर, मेट्रो, बिजली से जुड़े कार्यक्रम बनारस में चलते हुए हम देख रहे हैं. इसमें स्ट्रीट इंटीग्रेटेड ट्रैफिक सिस्टम को बनारस जैसे बेतरतीब चलने वाले शहर ने अपनाकर, समर्थन देकर बड़ा सन्देश दिया था. लेकिन इसके अलावे नमामि गंगे मिशन से लेकर इनलैंड वाटरवेज परियोजना तक किसी भी स्तर पर कोई फायदे का काम करती हुई दिखाई नहीं देती. पेयजल के लिए रोज मारपीट की खबरें आती हैं."

धनंजय ने वाराणसी की सोशल मीडिया पर तैरती तस्वीरों का जिक्र करते हुए अपना गुस्सा जाहिर किया. उन्होंने कहा,

"करोड़ो रुपये खर्च कर गोदौलिया चौराहे के सुंदरीकरण की तस्वीरें खूब शेयर की गईं, लेकिन मानसून की पहली बारिश में सीवेज लाइन क्रैश कर गई और सड़कें जलमग्न हो गईं. पूरा शहर पानी से लबालब भरा रहा और आवागमन ठप रहा. रंग रोगन और पेंटबाजी के काम से किसी बीमार पड़े आदमी का चेहरा एक मिनट को सुंदर दिख सकता है, लेकिन इस कवायद से ऑक्सीजन की कमी से होने वाली उसकी मौत नहीं रुक सकती है. दो सौ करोड़ के रुद्राक्ष कल्चरल कन्वेंशन सेंटर की जगह बनारस में अगर पीने का साफ पानी और पुरानी सड़कें और पुरानी गालियों को ठीक करते तो ज्यादा बेहतर होता."
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बीजेपी दफ्तर जाने वाले रास्ते ठीक, लेकिन बाकी रास्ते....

सड़कों को लेकर प्रोफेसर अनिल कुमार उपाध्याय भी नाराज दिखे. उन्होंने तो असामनता का सवाल उठाते हुए कहा,

"बनारस में बाबरपुर जाने के लिए एक अच्छा रोड बन गया है. जहाज से तो पैसे वाले जाएंगे, लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग के लोग जहाज पर तो जाएंगे नहीं, तो हवाई जहाज से यात्रा करने वालों के लिए जरूर सुविधाएं हो गई हैं लेकिन बनारस में बस, ट्रेन और तांगा से चलने वाले आम लोग के लिए सुविधाएं नहीं हैं. सिटी के बाहर, बाहर रोड सही हुई है, बीजेपी कार्यालय जाइए रोड अच्छी है, बड़ी कालोनियों की रोड अच्छी हो गई हैं. लेकिन बनारस की अन्य गालियों में जाइए तो आज भी वही गंदगी मिलेगी. गालियों में जल जमाव हो रहा है. जहां मन हो पैसा लगा देने से कोई विकास नहीं होता है. मेरा मानना है ये एक हप्पू मॉडल विकास है."
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बनारस के लंका क्षेत्र में रहने वाले राज अभिषेक का कहना है, "प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र होने का जितना फायदा काशी को होना था, उससे अधिक नुकसान आज बनारस झेल रहा है. 7 सालों में विकास के नाम पर सिर्फ बनारस के वास्तविक स्वरूप को तहस नहस किया गया है, और लीपा पोती के लिए चीनी बल्बों से शहर को रौशन कर रखा है. जलभराव बनारस की एक गंभीर समस्या है."

बनारस के प्रभारी मंत्री श्री आशुतोष टण्डन हैं, जो स्वयं उत्तर प्रदेश सरकार के नगर विकास मंत्री भी हैं. इसके बावजूद PM के संसदीय क्षेत्र की यह दशा है. बनारस को मोदी-योगी सरकार ने खूब बजट दिया है, पैसे की कमी नहीं है फिर भी बनारस का ये हाल कैसे?

"वाराणसी की कुछ सड़कें बनीं, लेकिन नौकरी के रास्ते नहीं खुले"

बनारस के रहने वाले युवा शांतनु के मुताबिक बनारस में मोदी सरकार बनने के बाद मध्यम या गरीब क्लास के लोगों के जीवन मे कोई फर्क नहीं आया है.

शांतनु कहते हैं,

"मोदी जी के आने के बाद आम लोगों की जिंदगी में ज्यादा बदलाव नहीं आया है, जैसे कि कोई जॉब या कोई नया काम शुरू हुआ हो. कोई नया इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट नहीं हुआ जिससे लोगों को रोजगार मिले.

शांतनु को गंगा की भी चिंता है, वो कहते हैं, "गंगा सरकार के मुख्य प्लान में था. गंगा को निर्मल बनाएंगे लेकिन हम लोग देख रहे हैं लगातार सीवर नदी में गिर रहे हैं. बनारस में काम हो रहा है लेकिन जो लोगों की जिंदगी में कुछ खास फर्क डाले ऐसा काम नहीं हो रहा.

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कांग्रेस भी हुई एक्टिव

यूपी कांग्रेस के चीफ अजय कुमार लल्लू जलभराव के वक्त काशी पहुंचे. वाराणसी दौरे के दौरान अजय लल्लू ने सड़कों पर भरे पानी में पैदल यात्रा कर कहा, 'काशी को क्योटो बनाने का सपना पीएम मोदी ने दिखाया. लेकिन ये फोटो तक ही सीमित रह गया.'

सरकारी अधिकारियों का तर्क

इस पूरे मामले मे क्विंट ने वाराणसी के जिम्मेदार अधिकारियों से बात की. अपर नगर आयुक्त बनारस देवी दयाल वर्मा के मुताबिक,

"जो हमारा सीवर सिस्टम है उसकी अपनी एक अपनी क्षमता है. लेकिन अगर एकदम से लगातार ढाई तीन घंटे बारिश हो जाये तो दिक्कत आ ही जाती है. 17 या 18 तारीख को लगातर 3 घंटे तक बहुत ज्यादा बारिश हुई थी जिसमें कई जगह वॉटर लॉगिंग हुई. बाद में एक घंटे बाद पानी निकल गया था. आगे इस तरह के जलभराव से उबरने के लिए जो हमारे मेन होल हैं उनको और अच्छा बना रहे हैं जिससे जलभराव न हो और काफी काम कराया भी जा चुका है."
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वही वाराणसी जलकल विभाग के जनरल मैनेजर रघुवेन्द्र कुमार कहते हैं, "वाराणसी में स्टॉर्म वाटर ड्रेन पड़ी हुई है और सही से सफाई जल निगम के द्वारा की जा रही है, बहुत तेज बारिश हुई थी लेकिन फिर तुरंत ही पानी निकल गया था. स्टॉर्म वाटर ड्रेन पूरे शहर में पड़ा हुआ है और पहले ये था भी नहीं. बाकी कुछ तोड़ कर कुछ नया नहीं किया गया है, अगर पहले कुछ होता तब तोड़ते. पहले कुछ व्यवस्था थी ही नहीं. पूरे वाराणसी में 76 किलोमीटर में स्टॉर्म वाटर ड्रेन पड़ा हुआ है उसकी सफाई का काम चल रहा है, थोड़ा बचा है वो भी हो जाएगा तो समस्या खत्म हो जाएगी."

अब इन सब सवाल-जवाब, वादे-दावे और सपनों के बीच सच तो ये है कि कुछ घंटों की बारिश ने वाराणसी को डुबा दिया. लोगों की इसलिए भी उम्मीदें और शिकायत दोनों हैं क्योंकि ये पीएम मोदी का संसदीय क्षेत्र है. अब देखना है कि क्या अगली बारिश में भी लोगों की यही शिकायतें रहती हैं या फिर काशी को डूबने से बचा लिया जाएगा?

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