बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी शायद ही ला पाएं विराट कोहली
विराट की टीम बोर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के साथ वापस आएगी, ऐसा तो मुश्किल लग रहा है.
विराट की टीम बोर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के साथ वापस आएगी, ऐसा तो मुश्किल लग रहा है.(फोटो:बीसीसीआई-ट्विटर)

बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी शायद ही ला पाएं विराट कोहली

क्रिकेट में बाहर जाती गेंद का पीछा करना बल्लेबाज के लिए बुद्धिमानी नहीं मानी जाती. ठीक इसी तरह क्रिकेट में आगे बढ़कर अनुमान लगाने की भी सलाह नहीं दी जाती. कमेंटेटर या विशेषज्ञ अक्सर पिच के व्यवहार को समझाते हुए हुए गच्चा खा जाते हैं.

क्रिकेट पंडित और खिलाड़ियों ने महसूस किया है कि किसी मैच के नतीजे का अनुमान लगाने से बेहतर है कि उसे बाहर जाती गेंद समझकर ‘छोड़’ दिया जाए. दोनों अच्छी तरह समझते हैं कि क्रिकेट में बुद्धिमानी इसी में है कि न तो गर्दन ज्यादा बाहर निकाली जाए और न ही जुबान.

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लेकिन, ये समय चुनाव का है और मतदाता की आंखें उम्मीदवारों की सम्भावनाओं का अनुमान लगाने में सजग हैं. यह खेल का समय भी है. भारत और ऑस्ट्रेलिया की टीमें एडि‍लेड में टेस्ट श्रृंखला का आगाज करते हुए एक-दूसरे का सामना करने जा रहे हैं. क्रिकेट का सट्टा बाजार, जो वास्तव में क्रिकेट सेंसेक्‍स होता है, चढ़ा हुआ है. यह भारत की जीत की सम्भावना पर संशय खड़े कर रहा है.

कई स्पष्ट कारण हैं, जिससे गेम भारत के पक्ष में कहा जा सकता है, क्योंकि हवा इसी दिशा में बह रही है. डेविड वार्नर और स्टीव स्मिथ की गैरमौजूदगी में ऑस्ट्रेलिया की ताकत आधी है. ये दोनों ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी के शाहरुख और सलमान खान माने जाते हैं. एक और साबित खिलाड़ी उस्मान ख्वाजा का घुटने में चोट की वजह से खेलना भी संदिग्ध है.

इस बीच कैप्टन विराट कोहली के चमत्कारिक रिकॉर्ड, वर्तमान फॉर्म और जीत के लिए उनकी मजबूत ललक के साथ भारत उफान पर है. भारत के तेज आक्रमण (उमेश यादव, जसप्रीत बुमरा) और चतुराई भरी गेंदबाजी (भुवी, शमी) में ‘आग’ है जो अतिरिक्त फैक्टर है. बाउन्ड्री पर मजबूती से जमे हुए विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की ही जीत होगी. हालांकि उनके आकलन में जो आशावाद है वह कई तरह के अगर-मगर के साथ ‘सशर्त लागू’ होने की तर्ज पर है.

“इन आकलनों में भारत की जीत कई सम्भावनाओं पर निर्भर करती है...”

(फोटो: AP)

तमाम बाधाओं/तर्कों/मजबूत सबूतों को ध्यान में रखते हुए ऐसा नहीं लगता कि विराट की टीम बोर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के साथ लौटने वाली है.

भारत क्यों नहीं जीत सकता

  • इतिहास भारत के पक्ष में नहीं है. 70 साल में भारत ने कभी कोई सीरीज ऑस्ट्रेलिया में नहीं जीती है.
  • देश से बाहर का टीम का हालिया रिकॉर्ड भी भारत के खिलाफ है. इंग्लैंड में हाल का दयनीय टेस्ट प्रदर्शन सबको याद है.
  • भारतीय बल्लेबाजों का हाल का फॉर्म बहुत विश्वास बढ़ाता नहीं दिखता. कोहिनूर कोहली को छोड़ दें, तो कोई भी बल्लेबाज उस तरह का प्रदर्शन नहीं कर पा रहा. जब प्रदर्शन की निरंतरता की बात आती है तो विराट ही ‘वन मैन आर्मी’ नजर आते हैं जो सभी फॉर्मेट में, सभी देशों में और सभी विरोधी टीमों पर भारी हैं.

पिछली सीरीज के दौरान बीच में ही टीम से बाहर कर दिए गये मुरली विजय की टेस्ट में वापसी हो रही है. प्रतिभाशाली राहुल की निरंतरता में कमी बेचैन करने वाली है. चेतेश्वर पुजारा और अजिंक्य रहाणे पर कुछ समय पहले तक बेंच पर बैठे रहने के दाग हैं. सफेद गेंदों के मास्टर रोहित शर्मा अब भी टेस्ट स्तर पर ऑलराउंड खिलाड़ी हैं.

सबसे चिंता की बात है शीर्ष बल्लेबाजी का लड़खड़ाने जाने का चरित्र, जो अब तक सही नहीं हो पाया है. शिखर ने अपना स्थान खो दिया है, विजय के करियर का अस्तित्व ही खतरे में दिख रहा है और पृथ्वी शॉ घायल हैं जिन्हें देश से बाहर साबित करना बाकी है.

सिडनी में सीए इलेवन के खिलाफ वॉर्मअप मैच में घुटने की चोट के बाद पृथ्वी शॉ को मैदान से बाहर ले जाना पड़ा था
सिडनी में सीए इलेवन के खिलाफ वॉर्मअप मैच में घुटने की चोट के बाद पृथ्वी शॉ को मैदान से बाहर ले जाना पड़ा था
(फोटो : एपी)
  • परम्परा भी भारत के खिलाफ है. ऐसे समय में जब भारत के लिए लय पाना अहम होता है और अच्छी शुरुआत की दरकार होती है, आम तौर पर भारतीय पहले टेस्ट में ही चोट खा जाते हैं और पिछड़ जाते हैं. न सिर्फ आंकड़ों में, बल्कि मनोवैज्ञानिक तौर पर भी.
  • परिस्थितियां भारत के विरुद्ध हैं. उछलती पिच ने भारत को कई बार असहाय बनाया है. बल्लेबाज गेंद की लाइन में आकर हिट करते हैं और चोटिल हो जाते हैं. ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों में इन आग उगलती गेंदों से भारतीय बल्लेबाजों को परखने का दमखम है.

ऑस्ट्रेलियाई भारतीय खेमे को रौंद सकते हैं जिसकी ये हैं वजह

1. क्रिकेट उनकी राष्ट्रीय पहचान है : इसी वजह से ऑस्ट्रेलिया को कम करके आंकना, भले ही वह कमजोर हो गयी हो, बड़ी भूल है. शीर्ष बल्लेबाज ऑस्ट्रेलिया के लिए नहीं खेल रहे हैं लेकिन जो प्लेइंग इलेवन है वह भी अपने गौरव को बचाने के लिए कमतर नहीं हैं. अपने घर में खेलते हुए, जहां की परिस्थिति को वे अच्छी तरह से समझते हैं, वे भारतीय टीम पर भारी पड़ेंगे.

2. तेज आक्रमण ऑस्ट्रेलिया की ताकत : भले ही शीर्ष बल्लेबाजी का क्रम बालू की भीत की तरह भड़भड़ा जाता हो, मगर आक्रमण हमेशा की तरह मजबूत है. मिशेल स्टार्क, जोश हैजेलवुड और पैट्रिक क्यूमिन्स कुछेक ऐसे खिलाड़ी हैं जो कड़ी परीक्षा लेंगे. जब इसी गर्मी में इंग्लैंड ने भारत की परीक्षा ली थी, तो कई बल्लेबाजों के पास जवाब नहीं थे. ऑस्ट्रेलिया में वैसी ही परिस्थिति में इस चुनौती का कोई नया नतीजा सामने आने वाला नहीं है.

3. ऑस्ट्रेलिया को साबित करने का मौका : जीत की भूख बेहतर प्रदर्शन का आधार होती है. ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट में संकट के बीच टीम और कोचिंग स्टाफ में बदलाव से एक अवसर पैदा हुआ है जो प्रतिकूल परिस्थितियों को दूर कर सकता है. एरोन फिंच और शॉन मार्श के लिए यह करियर का सवाल है. उनके लिए यह लॉटरी जीतने का मौका है. नये बल्लेबाजों के लिए भी ऐसा ही है जिन्हें खुशकिस्मती से ‘बैगी ग्रीन’ का बैज हासिल हुआ है.

सौरव गांगुली और ब्रायन लारा ने चार मैच की टेस्ट सीरीज के लिए दांव लगाया, तो इसलिए कि ऑस्ट्रेलियाई अक्सर आत्मघाती गोल कर लिया करते हैं. दूसरे महान खिलाड़ी भी ऑस्ट्रेलिया से बेहतर साबित करने का इसे भारत के लिए बड़ा मौका मानते हैं.

बेशक ऑस्ट्रेलियाई दिग्गज विपरीत नजरिया रखते हैं. वे जीत के प्रति आश्वस्त हैं और उन्हें भरोसा है कि टीम मौके पर अच्छा खेलेगी और अपने प्रशंसकों और देशवासियों की मौजूदगी को भुनाएगी. शायद श्रेष्ठ विश्लेषण के रूप में पूर्व कप्तान इयान चैपल के शब्द ही आखिरी हैं, जो बुद्धिमान प्रेक्षक हैं. वे सभी दृष्टिकोणों को खंगालने के बाद कहते हैं, ऑस्ट्रेलिया की जीत होगी. कैसे, पूछे जाने पर वे ईमानदारी से हथियार डाल देते हैं, “पता नहीं, यह मुझे अंदर से लगता है!”

इसके बावजूद कि बहुमत की राय भारत के पक्ष में है, ऑस्ट्रेलिया कोहली की टीम को चौंका सकती है.

(अमृत माथुर वरिष्ठ पत्रकार, बीसीसीआई के पूर्व महाप्रबंधक और भारतीय क्रिकेट टीम के प्रबंधक हैं. उनका ट्विटर हैंडल है @AmritMathur1. ये लेखक के विचार हैं. इसमें क्‍विंट की सहमति जरूरी नहीं है.)

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