मिलिए देश की पहली ट्रांसजेंडर जज से, लड़ी संघर्ष की लंबी लड़ाई  

पश्चिम बंगाल की जोइता मंडल की पहचान आज देश की पहली ट्रांसजेंडर जज के तौर पर है.

Published16 Jan 2018, 05:22 AM IST
साड्डा हक
4 min read

पश्चिम बंगाल की 30 वर्षीय जोइता मंडल की पहचान आज देश की पहली 'किन्नर' यानी ट्रांसजेंडर जज के तौर पर है. जोइता का जीवन में हार न मानने का जज्बा दिखाता है कि वह अपने संघर्ष से सबक लेकर समाज को एक नई सीख दे रही हैं. जोइता वृद्धाश्रम के संचालन के साथ रेड लाइट इलाके में रह रहे परिवारों की जिंदगियां बदलने में लगी हैं.

जोइता के इस सेवा और समर्पण भाव को देखते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने उनका सम्मान करते हुए उन्हें लोक अदालत का न्यायाधीश नामांकित किया है. इस तरह वे देश की पहली 'किन्नर' न्यायाधीश हैं. मध्य प्रदेश की व्यावसायिक नगरी इंदौर में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आईं जोइता ने कई मुद्दों पर और खासकर किन्नर समाज और रेड लाइट इलाके में रहने वाले परिवारों की समस्याओं पर खुलकर चर्चा की. साथ ही अपने जिंदगी के उन पलों को भी साझा किया, जब उन्होंने कई रातें रेलवे स्टेशन और बस अड्डों पर गुजारी थी.

इंदौर में एक कार्यक्रम में शिरकत करने आईं जोइता
इंदौर में एक कार्यक्रम में शिरकत करने आईं जोइता
(फोटो: IANS)

परिवार से मिला बुरा बर्ताव

जोइता अपने बीते दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि वे भी अपने को आम लड़की की तरह समझती थीं. बचपन इसी तरह बीता, जब उम्र 18 साल के करीब थी, तब उनका भी मन दुर्गा पूजा के वक्त सजने संवरने का हुआ, वे ब्यूटी पार्लर जा पहुंचीं, लौटकर आई तो घर के लोग नाराज हुए, वे उसे लड़का मानते थे. उस वक्त उन्हें इतना पीटा गया कि वे चार दिन तक बिस्तर से नहीं उठ सकीं और इलाज के लिए डॉक्टर के पास भी नहीं ले जाया गया.

“जब कॉलेज जाती थी तो सभी मेरा मजाक उड़ाया करते थे, इसके चलते पढ़ाई छोड़ दी. साल 2009 में मैंने घर छोड़ने का फैसला कर लिया. कहां जाउंगी कुछ भी तय नहीं था. इतना ही नहीं, एक रुपये भी पास में नहीं था. दिनाजपुर पहुंची तो होटल में रुकने नहीं दिया गया, बस अड्डे और रेलवे स्टेशन पर रातें गुजारीं. होटल वाला खाना तक नहीं खिलाता, वह पैसे देकर कहता है कि हमें दुआ देकर चले जाओ.”
जोइता मंडल, ट्रांसजेंडर जज  
समाज से तिरस्कार मिला तो घर छोड़ दिया
समाज से तिरस्कार मिला तो घर छोड़ दिया
(फोटो: फेसबुक)

आम किन्नर की तरह बिताई जिंदगी

जोइता बताती हैं कि दिनाजपुर में हर तरफ से मिली उपेक्षा के बाद उन्होंने किन्नरों के डेरे में जाने का फैसला किया और फिर उनके साथ रहते हुए वही सब करने लगीं जो आम किन्नर करते हैं, यानी बच्चे के पैदा होने पर बधाई गीत गाना, शादी में बहू को बधाई देने जाना. इस तरह उनके नाचने-गाने का दौर शुरू हो गया. लेकिन इन सबके बावजूद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी.

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समाज सेवा में कदम रखते हुए जोइता ने साल 2010 में दिनाजपुर में एक संस्था बनाई जो किन्नरों के हक के लिए काम करती है. इसके बाद उन्होंने बुजुर्गो के लिए वृद्धाश्रम स्थापित किया. रेड लाइट इलाके में रहने वाली महिलाओं, उनके बच्चों के राशन कार्ड, आधार कार्ड बनवाए और उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित किया.
जोइता ने संघर्ष के साथ अपनी पढ़ाई और समाज सेवा का काम जारी रखा
जोइता ने संघर्ष के साथ अपनी पढ़ाई और समाज सेवा का काम जारी रखा
(फोटो: फेसबुक)

कोर्ट के आदेश ने बदली जिंदगी

जोइता 14 अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का जिक्र करते हुए कहती है, "उस फैसले ने किन्नर समाज की जिंदगी में नई रोशनी लाई है. इस फैसले में उन्हें भी समाज का अंग मानते हुए महिला, पुरुष के साथ तीसरा जेंडर माना गया. इस फैसले ने लड़ने के लिए और ताकत दी. यह फैसला हमारे लिए किसी धार्मिक ग्रंथ से कम नहीं था. इसलिए मैंने उसे दिल में समा लिया."

संघर्ष से मिली सफलता

जोइता ने अपने अभियान को जारी रखा. एक तरफ सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ताकत दी तो आठ जुलाई 2017 का दिन उनके लिए ऐतिहासिक साबित हुआ, जब पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें लोक अदालत का न्यायधीश नियुक्त कर दिया. जोइता कहती हैं कि उन्होंने हालात से हारना नहीं सीखा. वह हर मुसीबत को अपने लिए सफलता का नया रास्ता मानती हैं.

आज उन्हें इस बात का कतई मलाल नहीं है कि वे किन्नर हैं. जहां लोग उनका मजाक उड़ाते थे, आज उसी इलाके से जब वे सफेद कार से निकलतीं हैं, तो गर्व महसूस करती हैं.

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