आखिर फेसबुक और ट्विटर पर गाली-गलौज कम कैसे हो? 
ट्विटर  की तरफ से सर्विस की शर्तों में बदलाव के मेसेज लोगों के पास पहुंच रहे हैं
ट्विटर की तरफ से सर्विस की शर्तों में बदलाव के मेसेज लोगों के पास पहुंच रहे हैं(फोटो: iStock)

आखिर फेसबुक और ट्विटर पर गाली-गलौज कम कैसे हो? 

अगर आप ट्विटर यूजर हैं, तो आपके पास भी ट्विटर की तरफ से सर्विस की शर्तों में बदलाव के मैसेज पहुंच रहे होंगे.

ट्विटर ने इस मैसेज में कहा है, “हम 2 अक्टूबर 2017 से अपनी सेवा शर्तें अपडेट कर रहे हैं. इन बदलावों के बाद यूजर्स इस बात को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे कि किन हालातों में ट्विटर किसी कंटेंट को हटा सकता है. इसके साथ ही, हम अपनी लायबिलिटी के प्रावधानों को समझना आसान बनाना चाहते हैं.”

ट्विटर के इस मेसेज में ये भी कहा गया है कि अगर आप इन बदलावों से सहमत नहीं हों तो आप अपना ट्विटर अकाउंट कभी भी डिएक्टिवेट कर सकते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद ट्विटर पर उनके खिलाफ आई अपमानजनक टिप्पणियों के चलते गुरुवार को ट्विटर ने ये चेतावनी भी दी है कि वो उसकी पॉलिसी नहीं मानने वाले लोगों के अकाउंट लॉक या निलंबित कर सकता है.

हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक, ट्विटर ने कहा है कि ऐसे व्यवहार को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, जिसमें किसी को प्रताड़ित किया जाए, धमकाया जाए या चुप कराया जाए. कंपनी ने ये अपील भी की है कि ट्विटर यूजर इस तरह के अकाउंट की शिकायत उससे करें.

सुरसा के मुंह की तरह बढ़ रहा है ट्रोलिंग का दायरा

ट्विटर पर लोगों को प्रताड़ित करना, गाली देना या अपमानित करना कोई नई बात नहीं है. ट्विटर समेत दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसे ‘ट्रोल्स’ की कमी नहीं है जो किसी भी मसले पर अपने विपक्षियों की आवाज को दबाने की कोशिश करते हैं.

सोशल मीडिया को समझने वाले लोगों का कहना है कि इनमें से ज्यादातर ‘ट्रोल्स’ फर्जी या गुमनाम अकाउंट के जरिए ऑपरेट करते हैं, इसलिए इन पर लगाम लगाना एक बड़ी चुनौती है. वैसे तो ट्विटर पर नया एकाउंट खोलने के पहले केवाईसी यानी नो योर कस्टमर का नियम भी है, लेकिन इस नियम को शायद ही कोई मानता हो.

अमेरिका में ट्विटर के फाइल किये गए रिटर्न के अनुसार उनके 8.5 फीसदी यूजर्स फेक हैं. हालांकि इंडस्ट्री का मानना है कि ट्विटर के 30 फीसदी तक यूजर्स फर्जी हो सकते हैं.

यूजर अकाउंट असली है या नहीं, इसकी पहचान करने के लिए यूजर्स अकाउंट को ट्विटर के नीले रंग के टिकमार्क से वेरिफाइड करने का सिस्टम भी है. लेकिन वेरिफाइड अकाउंट का ये सिस्टम भी फर्जी अकाउंट्स पर रोक लगाने में नाकाम है.

पूरी दुनिया में करीब 33 करोड़ और भारत में करीब 2.25 करोड़ लोग ट्विटर का इस्तेमाल करते हैं. अगर हम इसमें यू-ट्यूब, फेसबुक, वॉट्सऐप जैसे दूसरे प्लेटफॉर्म जोड़ दें तो ये तादाद कई गुना बढ़ जाएगी. फिलहाल देश की 30 फीसदी आबादी यानी करीब 40 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं. इनमें से करीब-करीब हर कोई यू-ट्यूब, फेसबुक, वॉट्सऐप और ट्विटर में से कम से कम एक मीडियम का इस्तेमाल तो करता ही है.

जाहिर है इतनी बड़ी तादाद के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर नजर रखने के लिए किसी पुख्ता नीति की जरूरत पड़ेगी, लेकिन अभी हमारे देश में ऐसी कोई सोशल मीडिया पॉलिसी नहीं है.



 हमारे देश में कोई सोशल मीडिया पॉलिसी नहीं है
हमारे देश में कोई सोशल मीडिया पॉलिसी नहीं है
(फोटो: राहुल गुप्ता)

ताकि सोशल मीडिया का दुरुपयोग न हो

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का लोग दुरुपयोग न करें, इसके लिए ऐसे मीडिया प्लेटफॉर्म ही अपनी पॉलिसी लेकर आते रहे हैं. फेसबुक के कम्युनिटी स्टैंडर्ड के मुताबिक वैसा कंटेंट जो लोगों पर उनकी नस्ल, जाति, राष्ट्रीयता, धर्म, लिंग, लैंगिक रुझान, अपंगता या रोग के आधार पर हमला करेगा.

उसे ‘हेट स्पीच’ यानी नफरत फैलाने वाला वक्तव्य समझा जाएगा और इसे मंजूर नहीं किया जाएगा. ऐसे ही मिलते-जुलते नियम कायदे यूट्यूब और ट्विटर के भी हैं. लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जिसके तहत सोशल मीडिया पर ‘ट्रोलिंग’ या ‘हेट स्पीच’ के मामले में कार्रवाई की जा सके.

भारत के इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट में अपमानजनक टिप्पणी से संबंधित एक प्रावधान सेक्शन 66ए के रूप में पिछली यूपीए सरकार ने शामिल किया था, लेकिन इस पर जमकर हंगामा मचा और 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया था. ऐसा माना जा रहा था कि सरकारें 66ए के प्रावधान का दुरुपयोग अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कर सकती हैं.

कौन लगाएगा सोशल मीडिया में ‘हेट स्पीच’ पर लगाम

ऐसा नहीं है कि देश में हेट स्पीच या नफरत फैलाने वाले भाषण के खिलाफ कोई कानून नहीं है, लेकिन ये सभी कानून जिस वक्त बनाए गए थे उस वक्त इंटरनेट की कल्पना तक नहीं की गई थी. भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धाराओं 153ए, 295ए और 505 में हेट स्पीच से निपटने के प्रावधान हैं.

सेक्शन 295ए में किसी समुदाय या व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने वाले काम करने पर सजा का नियम है. इसमें धार्मिक भावनाओं को आघात पहुंचाने वाले शब्द (लिखे या बोले गए) भी कानूनी कार्रवाई के दायरे में आते हैं.

सेक्शन 153ए में धर्म, जाति, जन्म स्थान, आवास या भाषा के आधार पर अलग-अलग समुदायों में नफरत फैलाने वाले भाषण शामिल होते हैं. वहीं सेक्शन 505 कहता है कि एक वर्ग या समुदाय को किसी दूसरे के खिलाफ भड़काने वाले बयान, अफवाह या रिपोर्ट को छापना या फैलाना दंडनीय है.

फिलहाल हेट स्पीच के मामलों में सरकारी कार्रवाई इन्हीं सेक्शंस के दायरे में होती है. सरकार ने इसी साल जून के अंत में एक सोशल मीडिया पॉलिसी लाने की बात कही थी, जिसमें राष्ट्र विरोधी प्रोपेगंडा और नफरत फैलाने वाले अफवाहों पर निगरानी के नियम होंगे.

इसके लिए गृह मंत्रालय ने एक कमेटी भी बनाई थी, जिसका काम ये देखना था कि इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट में राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं को किस तरह से शामिल किया जाए. इस कमिटी में इंटेलिजेंस ब्यूरो, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी और दिल्ली पुलिस के प्रतिनिधि भी थे.

सोशल मीडिया जिस तरह से किसी व्यक्ति, समुदाय या विचारधारा के खिलाफ नफरत फैलाने का माध्यम बन गया है, उस सूरत में सरकार को प्रो-एक्टिव होकर एक मुकम्मल सोशल मीडिया पॉलिसी तुरंत लाने की जरूरत है.