इंग्लिश मीडियम के बीच कैसी होती है हिंदी मीडियम वाले की लाइफ
दिल्ली में पढ़ाई के दौरान अपने आस-पास भाषाई भेदभाव के माहौल से गुजरना पड़ा.
दिल्ली में पढ़ाई के दौरान अपने आस-पास भाषाई भेदभाव के माहौल से गुजरना पड़ा.(फोटो: क्विंट हिंदी / श्रुति माथुर)

इंग्लिश मीडियम के बीच कैसी होती है हिंदी मीडियम वाले की लाइफ

हिंदी भाषी होने के नाते मुझे हमेशा से अपनी भाषा पर गर्व रहा है. क्योंकि इस भाषा में ही मैं खुद को व्यक्त करने में सबसे ज्यादा सहज हूं. बचपन से ही हिंदी में कहानियां, कविताएं और नाटक पढ़कर रचा और रमा हूं और उससे लिखने की प्रेरणा मिली. और सबसे अहम वो भाषा, जिसकी वजह से मेरी 'दाल-रोटी' चलती है. हां, ये बात अलग है कि मेरी मातृ भाषा बांग्ला है.

लेकिन जिंदगी में एक दौर ऐसा भी आया, जब लगा कि हिंदी से ज्यादा प्यार कहीं मुझे क्लास में पराया तो नहीं बना रहा है. ऐसा अहसास कराने की कोशिश हुई कि हिंदी मेरी ताकत नहीं, कमजोरी है...हालांकि ऐसा मानने वाले 'अंग्रेजीदां' लोगों की ये गलतफहमी दूर करने में मुझे कामयाबी भी मिली, देर-सवेर ही सही.

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कानपुर से दिल्ली आकर जब मैंने जर्नलिज्म और मॉस कम्युनिकेशन की पढ़ाई के लिए यहां के एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान में दाखिला लिया, तो शुरूआती दौर में मुझे अपने आस-पास भाषाई भेदभाव के माहौल से गुजरना पड़ा. हिंदी दिवस के मौके पर ऐसे ही कुछ खट्टे-मीठे और मजेदार अनुभवों को साझा कर रहा हूं.

ओरिएंटेशन डे

कॉलेज का पहला दिन था. क्लासरूम में जब मैं पहुंचा तो काफी चहल-पहल थी. कुछ लोग ग्रुप बनाकर बातचीत  कर रहे थे. कुछ लोग अकेले चुपचाप बैठे थे. उनमें से कई याद रह गए चेहरे भी दिखे, जिन्हें एंट्रेंस एग्जाम के दौरान मैंने देखा था. मैं शुरू से 'बैक बेंचर' रहा था. लिहाजा सबसे पीछे की एक सीट पकड़कर बैठ गया. कुछ देर बाद कोर्स कोऑर्डिनेटर आईं और सबका एक दूसरे से परिचय करवाने का सिलसिला शुरू हुआ.

फर्राटेदार अंग्रेजी में एक के बाद एक सब अपने-अपने बारे में बताने लगे. उन्हें देखकर मन में कशमकश होने लगी कि मैं अपना इंट्रोडक्शन अंग्रेजी में दूं या हिंदी में.

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इंग्लिश सब्जेक्ट में हमेशा से मेरे अच्छे मार्क्स आए. नींव अच्छी पड़ी थी, क्योंकि मैंने पांचवी तक की पढ़ाई इंग्लिश मीडियम से की थी. फिर छठवीं क्लास से ग्रेजुएशन तक हिंदी मीडियम में शिक्षा हुई. घर में हिंदी के साथ अंग्रेजी अखबार भी पढ़ता था, ग्रेजुएशन में एक सब्जेक्ट ‘English Language’ भी था, और साथ-साथ इंग्लिश स्पीकिंग का कोर्स भी कर रखा था. मेरी बोलचाल की अंग्रेजी ऊंचे दर्जे की तो नहीं, पर ठीक-ठाक जरूर थी. लेकिन जो पकड़ और सहजता हिंदी बोलने और लिखने में थी, वो अंग्रेजी में कभी नहीं आ पाई.

वापस आते है ओरिएंटेशन डे पर. जैसे-जैसे मेरी बारी करीब आती गई, मेरी ऊहापोह भी बढ़ती गई. मैंने अपनी आंखें बंद की और  मेरी बारी आने तक मैंने ठान लिया था कि मुझे करना क्या है. आखिरकार मैं खड़ा हुआ और बोलना शुरू किया -

“नमस्कार ! मेरा नाम शौभिक पालित है और मैं कानपुर का रहने वाला हूं.”

हिकारत भरी नजरों का हमला

इतना कहते ही क्लास में मौजूद सभी स्टूडेंट्स के सिर मेरी ओर घूम गए. उन्हें अजीब लगा और मुझे उनका ऐसे देखना. पूरी क्लास के ऐसे रिएक्शन पर कुछ पलों के लिए मैं भी ठिठक गया. माहौल में एक मनहूसियत वाला सन्नाटा पसर गया था. अगली लाइन हलक में अटककर रह गई. सब हिकारत भरी नजरों से मुझे घूर रहे थे, मानो मैंने हिंदी बोलकर कोई गुनाह कर दिया हो.

उनमें से कुछ लोग एक दूसरे को देखकर मंद-मंद मुस्कुराने लगे. मुझे साफ महसूस हो रहा था कि वो अपनी कुटिल मुस्कान और नजरों की भाषा के जरिए आपस में मौन संवाद स्थापित कर रहे थे...और उस संवाद में मेरे लिए सिर्फ उपेक्षा, धिक्कार और परिहास मौजूद थे. मौके की नजाकत को भांपते हुए कोर्स कोऑर्डिनेटर तुरंत हरकत में आईं और माहौल को संभालते हुए बीच में टोका-

"What happened class? Is anything funny? Please carry on Shawbhik"

अब मैंने दोगुने विश्वास के साथ आगे बोलना शुरू किया और अपना पूरा परिचय देते हुए पर्सनल और प्रोफेशनल जिंदगी की उपलब्धियों का जिक्र किया. मेरी बात खत्म होने के बाद एक बार फिर सबके चेहरे पर वही भाव उभर आये. मैं भी खुद को 'हंसों के बीच बगुला' जैसा महसूस हो रहा था. लेकिन खुद पर गर्व से सीना चौड़ा हुआ जा रहा था. ये कहना 'छोटा मुंह बड़ी बात' होगी कि उस वक्त मैं अपनी तुलना अटल बिहारी बाजपेयी से कर रहा था, जिन्होंने 1977 में बतौर भारत के विदेश मंत्री यूनाइटेड नेशंस में पहली बार हिंदी में भाषण दिया था.

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फ्रेशर पार्टी में भी मास कॉम डिपार्टमेंट के दूसरे बैच के स्टूडेंट्स मौजूद थे. वहां भी मैंने अपनी ही शैली में अपना परिचय दिया. कुछ लोगों की भौहें तनी, तो कुछ के चेहरे पर मुस्कान आई.

इंग्लिश मीडियम बनाम हिंदी मीडियम

कोर्स का सेशन शुरू होने के कुछ हफ्तों में धीरे-धीरे बैच के कुछ साथियों से घुल-मिल गया. और फिर समय के साथ वे साथी से दोस्त बन गए. वो भी मेरी तरह प्रवासी और हिंदी भाषी थे. लेकिन अंग्रेजीदां लोगों के बीच उन्हीं के रंग में रंगने की हुनर से अच्छी तरह वाकिफ थे (वो हुनर, जो मैं अपने अंदर कभी नहीं ला पाया). इसलिए उनसे मेरा तालमेल बैठ गया. हालांकि बैच के एक बड़े तबके के लिए मैं 'एलियन' ही बना रहा.

पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी ही था, और मैं 'ढीठ' बनकर अपनी प्यारी हिंदी का हाथ थामे हुए था. इसे मेरी जिद भी कहा जा सकता है. रोजमर्रा के लेक्चर्स के दौरान जब बाकी स्टूडेंट्स अंग्रेजी में सवाल-जवाब करते तो मैं हमेशा हिंदी में ही बोलता. और तो और, दूसरों के उलट मैं अपने प्रेजेंटेशन हमेशा हिंदी में ही देता. ये सबको ज्यादा 'इरिटेट' करता. पर मैंने कभी अपनी 'इमेज' की परवाह नहीं की. एग्जाम भी मैंने हमेशा हिंदी में ही दिए.

हिंदी से ही जीता दिल

दूसरे सेमेस्टर तक आते-आते मेरे बैचमेट्स को मेरी 'आदत' हो चुकी थी. लेकिन मेरी इमेज में निर्णायक मोड़ तब आया, जब कॉलेज फेस्ट हुआ. कॉलेज में एमबीए, बीबीए, एमसीए और बीसीए जैसे कई और कोर्स भी थे. मैंने डिबेट, फोटोग्राफी और प्ले कम्पीटीशन में फर्स्ट प्राइज जीतकर मासकॉम डिपार्टमेंट का सिर ऊंचा किया. प्ले भी मैंने ही लिखा और डायरेक्शन भी मेरा. डिबेट मैंने हिंदी में किया था.

इसके बाद दिल्ली के कई दूसरे कॉलेजों में आयोजित हुए इंटर-कॉलेजिएट फेस्ट में मैंने स्ट्रीट प्ले, डिबेट और स्टोरी राइटिंग कम्पीटीशन में प्राइज जीतकर अपने कॉलेज का नाम रौशन किया. इन कामयाबियों ने मुझे मेरे 'अंग्रेजी पसंद' बैचमेट्स के नजदीक ला दिया. अब मैं उनकी नजरों में अखरता नहीं था. मुझे उनसे प्यार और सम्मान हासिल होने लगा.

लेकिन सौ बात की एक बात ये है कि दो साल की पढ़ाई के दौरान इंग्लिश मीडियम और हिंदी मीडियम के बीच की वो 'खाई' हमेशा बनी रही. शायद ये ऐसी खाई है जो भारत में कभी भर ही नहीं सकती.

इसका सबक ये है कि हिंदी को उन लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया जा सकता है. मुमकिन है इसमें वक्त लगेगा.

आप सबको हिंदी दिवस की शुभकामनाएं.

(ये आर्टिकल पहली बार क्‍विंट हिंदी पर 14 सितंबर, 2018 को छपा था)

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