वो चार छात्र आंदोलन जिन्होंने इतिहास बदलकर रख दिया

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दिल्ली की जामिया यूनिवर्सिटी के बाहर खड़ी दिल्ली पुलिस
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क्योंकि युवावस्था से ही व्यवस्था डरती है, क्योंकि वे डरते हैं कि नौजवान उनसे डरते नहीं

दुनिया के हर कोने में व्यवस्था से युवावस्था का टकराव अवश्यंभावी है. क्योंकि असहमति और प्रतिरोध हर स्थान पर युवावस्था को पारिभाषित करते हैं. इसीलिए सत्ता को उनके विरोध में विद्रोह की बू आती है. यूं विश्वविद्यालय एक खास आयु वर्ग के युवाओं का परिसर होता है, लेकिन उनमें सब एक से नहीं होते. कई ऐसे निकलते हैं जो पाठ्यक्रम के बाहर की दुनिया को देखने-समझने की कोशिश करने लगते हैं. ऐसे कितने ही युवाओं ने दुनिया के कई देशों में इतिहास को बदलकर रख दिया.

दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद आंदोलन स्टूडेंट्स की देन

दक्षिण अफ्रीका का पूरा रंगभेद आंदोलन स्टूडेंट्स की देन था. नस्लीय भेदभाव ने सालों तक दक्षिण अफ्रीका में अश्वेतों का वैसे ही दमन किया था, जैसा हमारे देश में जातीय भेदभाव ने किया है. इसके विरोध में सबसे पहले युवा ही उठ खड़े हुए.

दक्षिण अफ्रीका में इसकी अलख जलाने वाले नेल्सन मंडेला छात्र जीवन के दौरान ही इस आंदोलन का हिस्सा बने थे. इस आंदोलन का एक अहम हिस्सा है सोवेतो अपराइजिंग.

16 जून 1976 को जोहानसबर्ग के करीब सोवेतो में स्कूली बच्चे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. उनका कहना था कि उन्हें अफ्रीकाना भाषा को जबरन सीखने को न कहा जाए. यह भाषा दमन की भाषा है जिसे सिर्फ अश्वेतों के लिए सीखना अनिवार्य किया गया था. इस आंदोलन को पुलिसिया कार्रवाई से क्रूरता से दबाने की कोशिश की गई. स्कूली बच्चों पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए, गोलियां बरसाई गईं.

इसके बाद रंगभेद आंदोलन में पूरे देश में जोर पकड़ा. युवाओं की ऊर्जा से ही यह आंदोलन क्रांति में बदला और उसने तानाशाह सत्ता को उखाड़ फेंका.

थ्यानमन स्क्वेयर के युवा विद्रोह ने जनतंत्र का रास्ता साफ किया

अपनी बात कहने में युवा क्यों पीछे हटेंगे. चीन के 1989 के थ्यानमन चौक पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन को कौन भूल सकता है. यह चीनी इतिहास का सबसे स्याह दिन था, जब चीन की सेना ने सरे आम सड़कों को खून से रंग दिया था.

दरअसल अस्सी के दशक में चीन में स्टूडेंट्स लगातार राजनैतिक नेतृत्व के साथ अपना मतभेद खुलकर व्यक्त कर रहे थे. वे भौतिकशास्त्री और यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वाइस प्रेजिडेंट फांग लिजी के जनतंत्र समर्थक विचारों से प्रेरित थे. लिजी चीनी समाज में खुलेपन की अवधारणा को छात्रों की अगुवाई में आगे लाने की कोशिश कर रहे थे.

इसी भावना से भरकर 4 जून, 1989 को सैकड़ों स्टूडेंट्स बीजिंग के थ्यानमन चौक पर जमा हुए. पर चीन की सरकार का कुछ और ही इरादा था. उसने सेना को इन विद्यार्थियों के दमन का आदेश दिया. थ्यानमन चौक पर गोले बरसाए गए. सैकड़ों लोग मारे गए. चीन सरकार के लिए यह शर्मिंदगी का सबब बना.

भले ही उसने स्टूडेंट्स के असंतोष को दबा दिया, लेकिन बढ़ते-बढ़ते यह आंदोलन जनांदोलन बना. फिर जनतंत्र की प्राप्ति के लिए संघर्ष में तब्दील हो गया. चीन की सरकार जनतंत्र की पदचाप को सुनना पड़ा. उसने अपनी नीतियों में बदलाव किए.

जब अमेरिकी युवा ही हो गए अमेरिका के खिलाफ

साठ के दशक में वियतनाम युद्ध में अमेरिका की भूमिका के खिलाफ सबसे पहले उसके अपने देश में ही विरोध हुआ. 1955 से 1975 के दौरान अमेरिका वियतनाम की अंदरूनी लड़ाई में कूद गया था. उसने उत्तरी वियतनाम के खिलाफ दक्षिणी वियतनाम को हथियार और सेना, दोनों मुहैय्या कराए थे, लेकिन अमेरिका के अपने युवा जन इस लड़ाई के सख्त खिलाफ थे. इसकी शुरुआत कॉलेज परिसर से ही हुई थी.

स्टूडेंट्स फॉर अ डेमोक्रेटिक सोसायटी नामक संगठन के स्टूडेंट्स का कहना था कि अमेरिका का यह कदम निंदनीय है. 1970 में केंट स्टेट यूनिवर्सिटी में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ, जिसमें चार स्टूडेंट मारे गए.

इस गोलीबारी ने पूरे देश में विरोध की लहर उठा दी. बहुत से कॉलेज और यूनिवर्सिटीज विरोधस्वरूप बंद कर दी गईं. 1973 में जब वियतनाम से अमेरिकी सेना वापस लौटी, तो राष्ट्रपति निक्सन ने कहा था- इसका बहुत बड़ा कारण यह है कि देश के युवा इसका विरोध कर रहे हैं.

छात्र आंदोलन ने केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार की नींव रखी

संपूर्ण क्रांति जयप्रकाश नारायण का वह नारा था जिसका आह्वान उन्होंने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए किया था, लेकिन इसकी शुरुआत छात्र आंदोलन से हुई थी. केंद्र की कांग्रेस सरकार के खिलाफ सत्तर के दशक में युवाओं में जबरदस्त असंतोष था. आजादी के बाद के सपने सच नहीं हुए थे. समाज में विभाजन और भ्रष्टाचार बढ़ रहा था.

गुजरात और बिहार में स्टूडेंट्स ने विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था. गुजरात में नव निर्माण आंदोलन आरंभ हो चुका था. 1974 में मार्च महीने में स्टूडेंट्स का जत्था बिहार विधानसभा पहुंचा. इरादा था कि विधानसभा को चलने ही न दिया जाए. पुलिस ने इसका जवाब हिंसा से दिया. कई छात्र मारे गए.

तब जय प्रकाश नारायण ने इस आंदोलन की अगुवाई की. शर्त यह थी कि आंदोलन अहिंसक रहेगा. इसके बाद देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के चलते आपातकाल की घोषणा हुई और फिर केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार ने सत्ता संभाली. आज के कई दिग्गज नेता अस्सी के दशक के छात्र आंदोलनों की ही देन हैं- लालू प्रसाद यादव उस दौरान छात्र संघ के अध्यक्ष थे, सुशील कुमार मोदी और रवि शंकर प्रसाद महासचिव और संयुक्त महासचिव थे. नीतिश कुमार, राजीव प्रताप रूडी और रामविलास पासवान भी इसी आंदोलन का हिस्सा थे.

कुल मिलाकर छात्र आंदोलन कोई नई बात नहीं, न ही बुरी बात हैं. जिन्हें युवाओं में अंधेरा, भीषण या भयानक दिखता है, वो उन्हें जानते ही नहीं. उनके शब्दों को पढ़िए. उनकी आलोचना में दिक्कत नहीं, बिना सोचे-समझे निंदा में है. क्योंकि स्टूडेंट्स का दमन हमारी दुनिया में इंसानियत की नाकामी और अपराधियों की जीत का आईना है.

दिल्ली में जामिया मिलिया में जब नौजवानों पर पुलिसिया हमला हुआ तो किसी ने कहा था- हिंसा का जिम्मा सिर्फ एक पक्ष का नहीं होता. हमेशा दो पक्षों की लड़ाई से ही हिंसा पैदा होती है. बेशक, हिंसा में दो पक्ष जरूर होते हैं, लेकिन अक्सर वो बराबर के नहीं होते.

हिटलर की जर्मनी में भी दो पक्ष थे. गुजरात में भी. जेएनयू और जामिया में भी.एक पक्ष हमला करता है, दूसरा पक्ष हमला झेलता है. और ऐसे में हमारी संतुलनवादी जुबान चुप रह जाती है.

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