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गुजरात में लव जिहाद कानून पर HC की टिप्पणी, यूपी के कानून से कितना अलग?

लव जिहाद कानून पर गुजरात हाई कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए कहा कि 'धोखा साबित होने तक FIR नहीं'

Published
भारत
3 min read
<div class="paragraphs"><p>गुजरात-उप्र के लव जिहाद कानून में तुलना</p></div>
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19 अगस्त को गुजरात हाईकोर्ट (Gujarat High Court) ने एक अंतरिम आदेश पारित करते हुए विवादास्पद गुजरात के लव जिहाद कानून के कुछ प्रावधानों पर रोक लगा दी है. इसके साथ ही गुजरात समेत देश के अन्य कई राज्यों में मौजूद लव जिहाद कानून के औचित्य को लेकर बहस शुरू हो गई है.

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गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि बल, लालच या धोखाधड़ी के दम पर अंतर-धार्मिक शादी के आरोप को साबित करने से पहले FIR नहीं दर्ज की जा सकती. हाईकोर्ट के अनुसार इस आदेश को अंतर-धार्मिक विवाह करने वाले लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान होने से बचाने के लिए पारित किया गया है.

अन्य राज्यों के लव जिहाद कानूनों पर भी यह आरोप लगता रहा है कि इसका उपयोग एक खास समुदाय के लोगों को निशाना बनाने के लिए किया जाता रहा है. अकेले उत्तर प्रदेश में जून 2021 तक 63 मामलों में 162 लोगों पर इस कानून के तहत FIR दर्ज किया गया था, लेकिन एक भी मामले में दोष सिद्ध नहीं हुआ था.

अब एक बार फिर हाईकोर्ट की तरफ से लव जिहाद कानून को लेकर सख्त टिप्पणी की गई है तो इस मौके पर गुजरात और उत्तर प्रदेश के लव जिहाद कानूनों में तुलना करके समझते हैं.

गुजरात और उत्तर प्रदेश के लव जिहाद कानून तुलना

गुजरात- केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से विवाह या विवाह के उद्देश्य के लिए धर्म परिवर्तन के मामले में परिवार न्यायालय या न्यायालय द्वारा विवाह को रद्द कर दिया जाएगा .कोई भी व्यक्ति, चाहे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष- बल, जबरदस्ती, या धोखाधड़ी द्वारा, या विवाह द्वारा, या विवाह की सहायता से धर्म परिवर्तन नहीं करवाएगा.


यूपी - दो धर्म के बीच शादी से 60 दिन पहले नोटिस देने की आवश्यकता होती है, लेकिन धर्म-परिवर्तन के पीछे की असली मंशा का पता लगाने के लिए मजिस्ट्रेट को पुलिस जांच करने की भी आवश्यकता होती है.

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गुजरात- लव जिहाद हुआ है या नहीं यह साबित करने का भार आरोपी, आरोप लगाने वाले और सहायक पर होगा.

यूपी - लव जिहाद हुआ है या नहीं यह साबित करने का भार एक व्यक्ति पर ना होकर उन सारे लोगों पर होगा जिन्होंने धर्म परिवर्तन "कराया" या "मदद" दी. पुलिस जांच में भी, यदि मजिस्ट्रेट संतुष्ट नहीं होता है, तो धर्मांतरण करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ अध्यादेश की धारा 11 के तहत आपराधिक कार्रवाई शुरू की जा सकती है.

गुजरात- इस अधिनियम के तहत अपराधों को गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध माना जाएगा और DSP के पद से नीचे के अधिकारी द्वारा जांच नहीं की जाएगी.

यूपी- सब-इंस्पेक्टर के पद से नीचे का कोई भी पुलिस अधिकारी इस कानून के तहत अपराध की जांच नहीं कर सकता है.

गुजरात- उल्लंघन करने पर कम से कम तीन साल और अधिक से अधिक पांच साल तक की कैद और कम से कम दो लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है. महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों के संबंध में चार से सात साल तक के कारावास और तीन लाख रुपये तक की सजा का प्रावधान किया गया है.


यूपी- अध्यादेश में एक साल की न्यूनतम सजा का प्रावधान है, जिसे पांच साल तक बढ़ाया जा सकता है और बार-बार अपराध करने पर अधिकतम सजा दोगुनी हो सकती है. यदि किसी महिला, नाबालिग या अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति से संबंधित व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करने का दोषी पाया जाता है तो अधिक सजा दी जाती है - इस मामले में सजा दो से 10 साल के बीच है.

लव जिहाद कानून का बढ़ता 'ट्रेंड'

भारत में जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ राज्य स्तर पर कानून पहले से बनते रहें हैं, लेकिन हाल के वर्षों में कई बीजेपी शासित राज्यों ने तथाकथित ‘लव जिहाद’ का हवाला देते हुए कड़े कानून बनाए हैं. इसमें गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्य शामिल हैं. लेकिन दोष साबित होने की न्यूनतम दर ने बार-बार इनके औचित्य पर सवाल उठाया है.

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