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'खारा गद्दार कौन?': दशहरा रैली में समावेशी हिंदुत्व पर कायम रहे उद्धव

शिवसेना के सदस्यों ने 56 साल में पहली बार दो अलग-अलग दशहरा रैलियों में शिरकत की, लेकिन दाेनों में एजेंडा एक ही था.

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मुंबई के शिवाजी पार्क में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पार्टी के वार्षिक 'दशहरा मेला' में हजारों समर्थकों की भीड़ को संबोधित करते हुए कहा और पूछा कि "इस साल का रावण अलग है, वह समय के साथ बदलता है. अभी तक उसके पास केवल 10 सिर थे, लेकिन अब उसके पास कितने सिर हैं?"

अब रावण के कितने सर हैं? इसके जवाब में भीड़ ने चिल्लाते हुए "50 सिर" कहा. वहीं उद्धव ने कहा कि इस साल के रावण में सिर के बजाय 50 'खोका' (करोड़ के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक बोली का शब्द) था. इसके साथ ही उन्होंने इस साल जून में महा विकास अघाड़ी (MVA) को तोड़ने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा एकनाथ शिंदे और उनके समर्थकों को 50 करोड़ रुपये दिए जाने के दावों का जिक्र करते हुए कहा उसे (आज के रावण को) 'खोकासुर' और 'धोकासुर' बताया.

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'दशहरा मेला' के मंच पर जैसे ही उद्धव पहुंचे सबसे पहले उन्होंने आस-पास मौजूद लोगों के सपोर्ट से वहां मौजूद भीड़ के सामने घुटने टेक दिए. इससे इस बात का संकेत मिलता है कि उनकी जो रीढ़ की हड्‌डी की सर्जरी हुई थी वह रिकवर हो रही है. सर्जरी को लेकर उद्धव अपने शब्दों में कहते हैं कि शिंदे ने उनकी "पीठ में छुरा घोंपा" है.

इसी दौरान, उसी समय शिंदे मुंबई के बीकेसी में एमएमआरडीए मैदान में एक अलग रैली में मंच पर पहुंचे, जहां ठाकरे परिवार के कई सदस्य और उनके वफादार उपस्थित थे. शिंदे उच्च दृष्टि पर चल रहे थे और पार्टी की विरासत पर दावा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे.

शिवसेना कैडर ने 56 वर्षों में पहली बार मुंबई में दो अलग-अलग दशहरा रैलियों में हिस्सा लिया, लेकिन दोनों रैलियों के भाषणों का एजेंडा एक ही (अपनी ताकत दिखाना और दूसरे गुट को गद्दार करार देना) था.

दोनों ने महीनों से चल रहे दावों और प्रति-दावों को संबोधित किया और कई जुड़े हुए संघर्षों को छुआ :

  • दोनों ने बाल ठाकरे की हिंदुत्व विचारधारा की विरासत का दावा किया.

  • दोनों का लक्ष्य सामने वाले पक्ष को 'गद्दार' कहना था.

  • दोनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का जिक्र किया.

  • दोनों ने पार्टी के चुनाव चिन्ह पर अपने अधिकार का दावा किया.

  • दोनों ने अपने पुत्रों का पुरजोर बचाव किया.

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हिंदुत्व त्यागने को लेकर, ठाकरे ने किया मोहन भागवत का जिक्र

ठाकरे और शिंदे द्वारा जो भाषण दिए गए उनमें ज्यादातर हिंदुत्व का एजेंडा हावी रहा. जहां ठाकरे ने 'समावेशी' हिंदुत्व के अपने विचार को विस्तार से बताया और शिंदे को "बीजेपी द्वारा लिखी स्क्रिप्ट का पालन किए बिना" इस पर एक खुली बहस के लिए चुनौती दी, वहीं शिंदे ने लगातार यह साबित करने पर जोर दिया कि सत्ता में बने रहने और कांग्रेस और एनसीपी के समर्थन का लाभ लेने के लिए उद्धव ने हिंदुत्व को छोड़ दिया था.

उद्धव ने अपनी बात दाेहराते हुए कहा कि उन्हें बीजेपी से हिंदुत्व के बारे में सीखने की जरूरत नहीं है. उद्धव ने नवाज शरीफ के जन्मदिन की पार्टी में शामिल होने और जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ हाथ मिलाने के लिए पीएम मोदी की आलोचना भी की और उन्होंने बीजेपी पर मूल्य वृद्धि और महंगाई के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए हिंदुत्व का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया.

उद्धव ठाकरे ने बढ़ती आय असमानता और बेरोजगारी की चुनौतियों के बारे में होसाबले के हालिया बयान का जिक्र करते हुए कहा कि "आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबले ने बीजेपी को आईना दिखाया है."

उद्धव ने कहा, "बाल ठाकरे ने हमेशा कहा है कि हमारा हिंदुत्व राष्ट्र की भलाई के लिए होना चाहिए."

उद्धव ठाकरे ने मुस्लिम निकायों के सदस्यों के साथ मोहन भागवत की हालिया बैठकों का हवाला देते हुए कहा कि "मेरे मन में मोहन भागवत जी के लिए बहुत सम्मान है. हाल ही में, वह एक मस्जिद गए थे. क्या इसका मतलब यह है कि उन्होंने हिंदुत्व को छोड़ दिया? वह वहां बातचीत के लिए गए थे."

उद्धव आगे कहते हैं कि "अगर मोहन भागवत किसी मस्जिद जाते हैं और बातचीत शुरू करते हैं, तो यह राष्ट्रहित में एक पहल है. लेकिन अगर हम कांग्रेस से हाथ मिलाते हैं, तो हम पर हिंदुत्व छोड़ने का आरोप लगता है? दिखावे के लिए यह सब कहा और प्रचारित किया जा रहा है."

अपने रुख को सही ठहराने के लिए उद्धव ने उत्तराखंड और बिलकिस बानो के हालिया मामलों का भी हवाला दिया. उन्होंने कहा कि "आरोपी (बिलकिस बानो मामले में) को कानून के नतीजों का सामना करना पड़ा और उन्हें सजा दी गई. लेकिन गुजरात सरकार ने उन्हें मुक्त कर दिया और जब आरोपी अपने गांवों में लौटे तो स्थानीय नेताओं ने माला पहनाकर उनका स्वागत किया." ठाकरे सवाल करते हुए कहते हैं कि "क्या यही बीजेपी के हिंदुत्व का विचार है?"

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इस बीच, शिंदे ने दावा करते हुए कहा कि एमवीए में रहते हुए उद्धव ने हिंदुत्व के प्रतीक वीर सावरकर की प्रतिष्ठा की रक्षा करने का प्रयास भी नहीं किया क्योंकि उन्हें "कांग्रेस के साथ गठबंधन के टूटने" की आशंका थी. उद्धव ने केवल कुर्सी के लिए बाल ठाकरे के हिंदुत्व की विचारधारा को छोड़ दिया था.

एनसीपी नेता नवाब मलिक का हवाला देते हुए शिंदे ने सवाल किया कि "आप कहते हैं कि शरद पवार ने 2019 में आपको सीएम बनाने की शर्त रखी थी, क्या आप उनके सामने यह शर्त नहीं रख सकते थे कि आपके मंत्रिमंडल में आतंकवादियों के साथ सहानुभूति रखने वाले नहीं होंगे?"

बाल ठाकरे की विरासत और पार्टी के प्रतीक पर दावा

पार्टी के चुनाव चिन्ह और नाम पर उद्धव और शिंदे दोनों ने ही अपना दावा ठोंका और दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर पार्टी के चुनाव चिन्ह और नाम के लायक नहीं होने का आरोप लगाया.

उद्धव ने कहा, "कोई कितना लालची हो सकता है? वह (शिंदे) पहले शिवाजी पार्क चाहते थे, अब उन्हें धनुष-बाण (प्रतीक चिन्ह) और मेरे पिता का नाम चाहिए." ठाकरे ने पूछा कि "अगर शिवसैनिक आपको यह नहीं लेने देंगे तो आप यह सब कैसे हासिल कर सकेंगे?"

चुनाव चिन्ह की लड़ाई के जवाब में शिंदे ने कहा, "शिवसेना कोई प्राइवेट लिमिटेड फर्म नहीं है, यह उन सभी लोगों की है जिन्होंने इसके लिए अपना खून-पसीना बहाया है."

शिंदे ने आगे कहा कि "यदि आपके सभी कार्यकर्ताओं ने अपने गांवों और तालुकाओं में शिवसेना को बढ़ावा नहीं दिया होता, तो आप उस पद पर नहीं पहुंचते, जिस पर आप हैं. कार्यकर्ता, विधायक और सांसद आपको छोड़ चुके हैं, फिर भी आप अपनी आंखें नहीं खोल रहे हैं."

शिंदे आगे कहते हैं कि "12 सांसद और 50 विधायक आपसे अलग क्यों हो गए? 14 राज्य प्रमुख मुझे अपना समर्थन देने के लिए दिल्ली क्यों आए? आपको उन्हें गद्दार करार देने से पहले आत्म-निरीक्षण करने की जरूरत है."

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2019 फ्लैशपॉइंट : मोदी-शाह पर ठाकरे ने बोला हमला, शिंदे ने किया बचाव

अमित शाह पर हमला करते हुए ठाकरे ने कहा कि उन्होंने 2019 में शिवसेना से 2.5 साल के लिए सीएम पद साझा करने के वादे को तोड़ दिया था.

उद्धव ठाकरे ने कहा कि "रुपये के साथ देश का कद गिर रहा है, लेकिन गृह मंत्री अमित शाह क्या कर रहे हैं? मुझे समझ में नहीं आता कि वह देश के मंत्री हैं या भाजपा के आंतरिक मंत्री हैं. वह राज्यों का चक्कर लगा रहे हैं और सुनिश्चित कर रहे हैं कि विपक्षी सरकारें गिरें."

ठाकरे ने कहा कि वह "अपने दिवंगत माता-पिता और छत्रपति शिवाजी की शपथ लेते हैं" कि शाह ने मुख्यमंत्री का पद साझा करने का अपना वादा तोड़ दिया था.

इस बीच, शिंदे ने ठाकरे पर 2019 में बीजेपी की पीठ में खंजर घोंपने का आरोप लगाया और कहा कि वह (ठाकरे) पीएम मोदी और अमित शाह को उनके महत्व से कम समझ रहे हैं, जो (मोदी और शाह ने) वास्तव में बाल ठाकरे के सपनों को सच कर रहे हैं.

शिंदे ने सवाल दागते हुए कहा कि "आप अमित शाह को अफजल खान कहते हैं? उन्होंने ही कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाया, जोकि बाल ठाकरे का सपना था. आपने राम मंदिर पूरा नहीं कर पाने पर उनका मजाक उड़ाया. अब राम मंदिर बनकर तैयार हो रहा है और इसको बनाने की समय-सीमा (तारीख) निर्धारित है. बाल ठाकरे के सपनों को किसने पूरा किया? मोदी और शाह ने किया, आप उनका मजाक कैसे उड़ा सकते हैं?"

शिंदे ने कहा कि ठाकरे असली गद्दार थे, क्योंकि 2019 में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को मिले जनादेश के साथ उन्होंने विश्वासघात किया था.

शिंदे ने सवाल करते हुए कहा कि "क्या आपने अपने कैंपेनों में पीएम मोदी और बाल ठाकरे की तस्वीरों का इस्तेमाल वोट मांगने के लिए नहीं किया?"

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दोनों ने शक्ति प्रदर्शन किया, लेकिन क्या कोई स्पष्ट विजेता था?

दोनों भाषण क्रूर थे, भाषा व्यवस्थित नहीं थी. दोनों में शिवसेना की ठेठ शब्दावली (कभी-कभी असंसदीय शब्दों का उपयोग, व्यक्तिगत हमले और नाम-पुकार) के स्वर थे.

दोनों रैलियों में समर्थकों की भीड़ पर सभी की निगाहें टिकी हुई थीं. दोनों नेताओं ने इसी भीड़ का उल्लेख करते हुए अपने भाषणों को शुरू और समाप्त किया.

उद्धव ने भी अपने खेमे के अन्य सभी नेताओं की तरह अपने संबोधन में दावा करते हुए कहा कि बीकेसी में जो समर्थक जुटाए गए हैं उनको "भुगतान करके (पैसे देकर) बुलाया गया. लेकिन पार्टी के सभी वफादार शिवाजी पार्क में पहुंचे थे."

उद्धव के संबोधन में करीब 45 मिनट तक शिंदे और बीजेपी पर निशाना साधते हुए तीखे प्रहार किए गए. शिंदे का दो घंटे का भाषण उन बयानों से भरा हुआ था जो उनका गुट विद्रोह के बारे में करता रहा है, इसके अलावा भाषण में उनकी सरकार के 100 दिनों की मुख्य विशेषताएं बताई गईं और उद्धव के व्यक्तित्व के बारे में कई खोखले दावे किए.

उद्धव ने अपने भाषण को समाप्त करते हुए कहा और पूछा कि "जिस तरह रावण एक संत का वेश धारण करके आया और सीता का अपहरण कर लिया, उसी तरह ये गद्दार बाल ठाकरे के वेश में हैं और यहां सेना (शिवसेना) को लेने के लिए हैं. क्या आप ऐसा होने देंगे?"

हालांकि इस बात का निष्कर्ष निकालना मुश्किल है कि कौन अधिक मजबूत हुआ, दोनों नेता विचलित नहीं दिखे, और एक-दूसरे को सबक सिखाने का वादा किया. इस वजह से पार्टी के चुनाव चिन्ह के लिए लड़ाई पहले की तुलना में अधिक दिलचस्प बन गई है.

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