आखिर सरकार और संगठन कुलदीप सिंह सेंगर से इतना डरते क्यों रहे?
बीजेपी आलाकमान ने मामले का संज्ञान नहीं लिया होता तो कुलदीप सिंह सेंगर अभी भी पार्टी की शोभा बढ़ाते नजर आते
बीजेपी आलाकमान ने मामले का संज्ञान नहीं लिया होता तो कुलदीप सिंह सेंगर अभी भी पार्टी की शोभा बढ़ाते नजर आते(फोटो: Altered By Quint Hindi)

आखिर सरकार और संगठन कुलदीप सिंह सेंगर से इतना डरते क्यों रहे?

सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार और राज्य में पार्टी संगठन के अंदर वो कौन लोग थे जो कुलदीप सिंह सेंगर के लिए 15 महीने तक कवच बने हुए थे ? वो कौन हैं जो विधायक की गिरफ्तारी के कुछ घंटों तक उसे बचाने के लिए बीच रास्ता निकालने में लगे रहे ? क्या मजबूरी थी कि गंभीर आरोप लगने के बावजूद सेंगर के खिलाफ पार्टी ने कोई कार्रवाई नहीं की.

सूत्रों का तो कहना है कि अगर इस भी बार दिल्ली में बैठे आलाकमान ने मामले का संज्ञान नहीं लिया होता तो कुलदीप सिंह सेंगर अभी भी बीजेपी की शोभा बढ़ाते नजर आते.

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फिलहाल उन्नाव रेप केस के आरोपी कुलदीप सिंह सेंगर को बीजेपी ने बाहर का रास्ता तो दिखा दिया, लेकिन कार्रवाई करते-करते बहुत देर हो गई. जिस पार्टी में नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की रवायत रही हो, जिस पार्टी में सिर्फ असलहा लहराने पर विधायक की बर्खास्तगी का फरमान सुना दिया जाता हो. उसी पार्टी में 15 महीने तक एक ऐसे शख्स को बचाने की कोशिश की जाती रही, जिसके दामन पर नाबालिग से रेप और उसके परिवार के लोगों की हत्या का आरोप लगा.

विधायक के साथ ‘चट्टान’ की तरह खड़ी रही यूपी बीजेपी !

पिछले पंद्रह महीनों के दौरान उन्नाव रेप कांड में सब कुछ सामने था. आरोपी उन्नाव के बांगरमऊ से विधायक कुलदीप सिंह सेंगर हैं, तो यूपी सरकार भी सवालों के घेरे में. ऐसा लगा कि सब कुछ जानते हुए भी उन्नाव पुलिस अनजान बनी थी. विधायक के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय पुलिस ने रेप पीड़िता के परिवार को ही निशाना बनाया. सिर्फ पुलिस ही क्यों बीजेपी भी अपने दागी विधायक के साथ चट्टान की तरह खड़ी थी. ये बातें बेबुनियाद नहीं, इसे समझने के लिए हम आपको फ्लैशबैक में लेकर चलते हैं.

कुलदीप सिंह सेंगर के चेहरे पर दिखता था सत्ता का रौब

13 अप्रैल 2018 की सुबह सीबीआई ने कुलदीप सिंह सेंगर को लखनऊ स्थित उसके घर से गिरफ्तार किया. कहा जाता है कि ये गिरफ्तारी तब हुई जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले का संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई. जेल जाने के कुछ घंटे पहले तक विधायक कुलदीप सेंगर बेफिक्र था. 11 अप्रैल की रात, जब उन्नाव रेप केस चैनलों, न्यूज पेपर की सुर्खियों में था. सबकी नजरें इसी घटना पर लगी थी कि किसी भी वक्त आरोपी विधायक गिरफ्तार होगा. सोशल मीडिया पर सरकार की छिछालेदर चल रही थी. तभी कुलदीप अचानक लखनऊ एसएसपी के आवास पर पहुंचा.

चैनलों ने हिरासत, पूछताछ जिसे जो भी लगा न्यूज ब्रेक करने लगे. लेकिन कुछ देर बाद एसएसपी से मिलकर मुस्कुराते हुए विधायक बाहर आया. पत्रकारों से बताया कि बस एसएसपी से मिलने चला आया था. यह सुनते ही उसके गिरफ्तारी के कयास की भी हवा निकल गई. यही नहीं दबंगई देखिए इस दौरान कुछ पत्रकारों ने ज्यादा कुछ पूछाना चाहा तो उसके गुर्गों ने मारपीट करने में भी देर नहीं की.

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जेल में भी रुतबा, जीत के लिए धन्यवाद देने पहुंचे साक्षी महाराज

विधायक के चेहरे पर ना तो कानून का खौफ दिख रहा था और न ही पार्टी का. ऐसा किसी के साथ तब होता है जब उसकी हैसियत इतनी मजबूत रहती है कि वो अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबा दे. कुलदीप सिंह सेंगर को लखनऊ में बैठे अपने आकाओं पर इतना भरोसा था कि, उनके रहते उसका कोई बाल भी बांका कर सके. वो जेल तो जरूर गया लेकिन जल्द बाहर आने का विश्वास था.

यही नहीं वो इतना कॉन्फिडेंट था कि पार्टी भी उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगी. और हुआ भी कुछ ऐसा ही. आरोपी विधायक पंद्रह महीनों से जेल में है, लेकिन बीजेपी की राज्य ईकाई ने उसके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं की. कार्रवाई तो छोड़िए जनाब. उन्नाव से जीत हासिल करने के बाद सांसद साक्षी महाराज कुलदीप सिंह सेंगर का हाल-चाल जानने के लिए सीतापुर जेल तक पहुंच गए थे.

आलाकमान ने दिया दखल, हेलिकॉप्टर से यूपी अध्यक्ष को दिल्ली बुलाया

इस बीच रायबरेली हादसे के बाद ये मामला दूसरी बार सुर्खियों में आया तब बीजेपी की किरकिरी होने लगी. सोनभद्र कांड के बाद पहले ही बैकफुट पर चल रही यूपी सरकार के लिए ये दूसरा बड़ा झटका था. विपक्ष ने इस मामले को हाथों हाथ लिया और सड़क से लेकर संसद तक यूपी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

आजम खां के विवादित बोल पर गला फाड़ने वाले बीजेपी नेताओं के लिए उन्नाव रेप कांड पर जवाब देते नहीं बन रहा था. चारों तरह से भद्द पिटती देख पार्टी आलाकमान को लगा कि अब कुलदीप सेंगर के खिलाफ बड़ा फैसला लेने का वक्त आ गया है. बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व इस मामले में राज्य इकाई से इस कदर खफा था कि उसने 31 जुलाई को हेलिकॉप्टर भेजकर यूपी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह को दिल्ली बुला लिया.

जिस वक्त प्रदेश अध्यक्ष का फरमान मिला, वो अयोध्या में एक कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे थे, लेकिन कार्यक्रम को बीच में ही छोड़ वो दिल्ली के लिए रवाना हो गए. सूत्रों के मुताबिक पार्टी आलाकमान ने इस मामले में स्वतंत्र देव सिंह के साथ ही प्रदेश संगठन के महामंत्री सुनील बंसल से भी जवाब तलब किया. इन दोनों नेताओं से ये पूछा गया कि इस मामले में प्रदेश संगठन में कहां और किस स्तर पर चूक हुई ?

...जब आडवाणी ने नैतिकता के आधार पर दिया था इस्तीफा

आमतौर पर बीजेपी को लेकर कहा जाता है कि इस पार्टी में आज भी अनुशासन को महत्ता दी जाती है. पिछले दिनों जब उत्तराखंड के बेअंदाज विधायक प्रणव सिंह चैंपियन का असलहों के साथ डांस का एक वीडियो वायरल हुआ तो पार्टी ने एक्शन लेते देर नहीं की. प्रणव चैंपियन ने तो सिर्फ असलहा दिखाया था लेकिन कुलदीप सेंगर जैसे विधायकों ने तो एक नाबालिग की जिंदगी ही उजाड़ दी. फिर भी उसके खिलाफ कार्रवाई करने में बीजेपी ने 15 महीने का वक्त लगा दिया. जबकि बीजेपी ऐसी पार्टी है जहां सिर्फ नैतिकता को आधार मानकर इस्तीफा दे दिया जाता है.

मिसाल के तौर पर साल 1996 में जब जैन हवाला केस में बीजेपी के सीनियर नेता और तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी पर रिश्वत लेने के आरोप लगे तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इस्तीफा देते हुए उन्होंने ऐलान किया कि जब तक वो जैन हवाला केस से बरी नहीं हो जाते. तब तक सदन में कदम नहीं रखेंगे. आडवाणी ने अपना वादा निभाया भी.

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सीएम योगी का ‘चहेता’ होने का आरोप!

कुलदीप सिंह सेंगर की बादशाहत का दायरा इतना बड़ा था कि मामूली सा विधायक होने के बाद भी उसकी हैसियत किसी कैबिनेट मंत्री से कम नहीं थी. यही कारण है कि उसके ऊपर हाथ डालने की कुवत ना तो प्रदेश के किसी पुलिस अधिकारी में था और ना ही पार्टी के किसी नेता के पास.

बीजेपी ज्वाइन किए हुए उसे जुम्मा-जुम्मा तीन साल भी नहीं हुए थे लेकिन पार्टी के अंदर उसकी तूती बोलने लगी थी. कहा तो ये भी जा रहा है कि अगर वो जेल नहीं जाता तो सांसदी के लिए भी दावेदारी करता. कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि कुलदीप सिंह सेंगर सीएम योगी आदित्यनाथ का भी चहेता बन गया था.

ऐसे में अगर विधायक के खिलाफ दोनों बार उसके खिलाफ कार्रवाई हुई तो दिल्ली से आए आदेश पर. पहली बार जब विधायक की गिरफ्तारी हुई तो सीबीआई का अहम रोल था. तो दूसरी बार जब बीजेपी ने इसके खिलाफ निष्कासन की कार्रवाई तो इसके पीछे भी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ही था.

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