बाराबंकी: क्या असली चौकीदारों की भी है चांदी?

बाराबंकी: क्या असली चौकीदारों की भी है चांदी?

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चुनाव के इस मौसम में सबसे ज्यादा जो शब्द ट्रेंड कर रहा है वो है चौकीदार. ट्विटर पर लोग नाम के आगे चौकीदार शब्द लगाने लगे हैं. लेकिन असली चौकीदारों की सुनने वाला कोई नहीं है. ड्यूटी के अलावा भी इन चौकीदारों को अलग अलग तरह के काम करने पड़ते हैं.

चौकीदारों को जितना पैसा मिलता है वो बहुत कम है. जैसे तैसे उनकी जिंदगी का गुजारा होता है.

हमको 50 रुपया रोज मिलता है. यहीं चांदी और यही सोना है. तो खूब चांदी है हमारी. किसी सरकार ने हमारी सुनवाई नहीं की . मुलायम सिंह की सरकार में हमारी सुनवाई हुई थी. और किसी सरकार ने हमको एक रुपया नहीं दिया.
धीरज, चौकीदार
हम करीब 32 साल से चौकीदार हैं. इन सालों में सिर्फ अखिलेश भैया और मुलायम भैया ने हमारे पैसे तो 100 से 300 किए, 300 से 500 किए, 500 से हजार किए और1000 से 1500 किए. उसके बाद में किसी ने नहीं देखा कि बूढ़े जिन्दा हैं कि नहीं. उसी 50 रुपये में हमने बच्चे बड़े किए, जिंदा रहे.
राम शंकर, चौकीदार

चौकीदारी में सिर्फ यही समस्या नहीं है. इन लोगों से चौकीदारी के अलावा बाकी काम भी कराए जाते हैं.

हमसे कहते हैं ए चौकीदार खाना ले आओ, पानी ले आओ, सब्जी ले आओ, साइन करा लाओ लेकिन जल्दी आना. अगर हमारा बच्चा बीमार हो जाए तो कहते हैं तुम्हारा बच्चा रोज ही बीमार होता है, हर बात पर डांट दिया जाता है. बस इसलिए लगे हैं कि सरकार पैसा बढ़ाएगी तो हमारा लड़का भी नौकरी में लगेगा और पढ़ेगा.

चौकीदार शब्द कितना भी चर्चा मे हो लेकिन असल चौकीदारों के हालात अलग ही हैं. बाराबंकी के आसपास के ये चौकीदार कम पैसे में काम करते हैं, जैसे तैसे जिंदगी का गुजारा करते हैं. कहीं कोई सुनवाई नहीं है. सिर्फ इसी उम्मीद में चौकीदारी कर रहे हैं कि सरकार कभी तो पैसा बढ़ाएगी, जिससे इनके बच्चे पढ़ लिखकर कोई और काम कर सकेंगे. कहीं दूसरी जगह नौकरी मिलेगी तो शायद जिंदगी बेहतर तरीके से जिएंगे.

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