कॉरपोरेट वर्ल्‍ड में MeToo : अभी भी बेहद मुश्किल है रास्ता
भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर में यौन शोषण को लेकर ज्यादातर खतरनाक सन्नाटा पसरा रहता है.
भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर में यौन शोषण को लेकर ज्यादातर खतरनाक सन्नाटा पसरा रहता है.(फोटो: iStock) 

कॉरपोरेट वर्ल्‍ड में MeToo : अभी भी बेहद मुश्किल है रास्ता

नई सदी के शुरुआती दिनों तक ‘इंफोसिस’ अमेरिकी स्टॉक एक्सचेंज नैस्डैक में लिस्ट होने वाली पहली भारतीय कंपनी बनकर दुनियाभर में पहचान बना चुका था. कंपनी को अंतरराष्ट्रीय पटल पर पहचान दिलाने वाली टीम के अग्रणी थे डायरेक्टर और ग्लोबल सेल्स हेड फणीश मूर्ति. उसके कुछ महीनों बाद ही फणीश गलत वजहों से सुर्खियों में आए. अमेरिका में उनकी सेक्रेटरी रेका मैक्सिमोविच ने उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए अदालत का दरवाजा खटखटा दिया.

फणीश ताकतवर थे, इंफोसिस की तत्कालिक जरूरत भी, लेकिन इंफोसिस प्रमुख एनआर नारायणमूर्ति ने बिना वक्त गंवाए फणीश को न केवल नौकरी से निकाला, बल्कि मैक्सिमोविच को 30 लाख डॉलर का हर्जाना देते हुए मामले को आउट ऑफ कोर्ट सेटल भी किया.

नारायणमूर्ति का मानना था कि चूंकि मैक्सिमोविच के साथ इंफोसिस में रहते हुए दुर्व्यवहार हुआ है, इसलिए उन्हें हर्जाना देना कंपनी की नैतिक जिम्मेदारी बनती थी.

गूगल ने 2 साल में 48 आरोपी एम्प्लॉई को निकाला

सोलह साल बाद जब उम्मीद की जानी चाहिए कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को लेकर कंपनियां पहले से अधिक सजग और संवेदनशील हो जाएंगी, दुनिया की बेहतरीन कंपनियों में एक ‘गूगल’ आरोपों से घिरा नजर आ रहा है. दो दिन पहले दुनियाभर में गूगल के हजारों कर्मचारी यौन उत्पीड़न की शिकायतों के निपटारे में कंपनी के रवैये के खिलाफ सड़कों पर उतरे.

मामले ने न्यूयॉर्क टाइम्स की उस रिपोर्ट के बाद तूल पकड़ा, जिसमें कहा गया है कि गूगल ने 2013 में एंड्रॉयड तकनीक के जनक और यौन उत्पीड़न के अभियुक्त एंडी रुबीन को, आरोप साबित हो जाने के बावजूद कंपनी छोड़ने के एवज में 9 करोड़ डॉलर का पैकेज दिया था. विरोध में गूगल के टोक्यो से लेकर सैन फ्रैंसिस्को और सिंगापुर से लेकर लंदन तक के कर्मचारी शामिल थे. भारत में भी गूगल कर्मचारियों के विरोध प्रदर्शन ने सुर्खियां बटोरीं.

हालांकि न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के बाद कंपनी ने ये बयान जारी कर मामले को संभालने की कोशिश की थी कि पिछले दो साल में सेक्सुअल हैरासमेंट के मामलों में 48 कर्मचारियों को गूगल से निकाला जा चुका है, जिसमें 13 सीनियर मैनेजर या उससे ऊंचे पद पर बैठे लोग शामिल थे.

विरोध में शामिल हुई गूगल की महिला कर्मचारियों का कहना है कि उनका गुस्सा केवल एंडी रुबीन के मामले को लेकर नहीं, बल्कि सामने आई एक घटना के पीछे छिपी रह गईं उन सैकड़ों मानसिक यांत्रणाओं का है, जिसे कंपनी बड़ी सफाई से दबाती चली आई है.

गूगल पर पहले से ही वेतन को लेकर महिलाओं और पुरुषों के बीच भेदभाव करने का आरोप है और फिलहाल मामले की अमेरिकी अदालतों में सुनवाई चल रही है.

सवाल ये है कि जब अमेरिका जैसे देश में गूगल जैसी कंपनी में काम कर रही औरतों को अपने ऊपर हो रहे शोषण के खिलाफ एकजुट होने में इतना वक्त लगता है, तो बाकी देशों में काम कर रही औरतों से क्या उम्मीद लगाई जाए?

संगठित और पढ़े-लिखे लोगों का क्षेत्र माने जाने वाले कॉरपोरेट सेक्टर में भी यौन शोषण को लेकर ज्यादातर खतरनाक सन्नाटा पसरा रहता है. इस तरह के मामले सामने आने पर या तो उसे दबाने की कोशिश की जाती है या फिर साबित करने का दारोमदार पीड़िता के ऊपर डालकर उसके लिए परिस्थितियां और मुश्किल कर दी जाती हैं.

कॉर्पोरेट सेक्टर में यौन शोषण को लेकर ज्यादातर खतरनाक सन्नाटा पसरा रहता है.
कॉर्पोरेट सेक्टर में यौन शोषण को लेकर ज्यादातर खतरनाक सन्नाटा पसरा रहता है.
(फोटो:iStock)

विशाखा गाइडलाइन्स पर कितनी संजीदा भारतीय कंपनियां?

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए 1997 में आई विशाखा गाइडलाइन्स के बाद 2013 में भारत में ‘सेक्सुअल हैरासमेंट ऑफ वुमन एट वर्कप्लेस’ कानून भी बना. इसके तहत 10 से ज्यादा कर्मचारियों वाली हर कंपनी के लिए यौन उत्पीड़न की शिकायतों की जांच के लिए एक आंतरिक शिकायत आयोग (ICC) बनाया जाना अनिवार्य था. साल भर के अंदर इस पर अमल नहीं करने वाली कंपनियों के लिए जुर्माने का प्रावधान भी था.

हालांकि कानून बनने के दो साल बाद अर्न्स्ट एंड यंग के एक सर्वे में ये बात सामने आई कि केवल 69 फीसदी कंपनियों ने आईसीसी का गठन किया. यही नहीं, 60 फीसदी से ज्यादा कंपनियों ने उत्पीड़न की शिकायतों को संवेदनशीलता से सुनने और निपटाने के लिए अपने आईसीसी के सदस्यों की ट्रेनिंग की पहल तक नहीं की थी. एक-तिहाई महिला कर्मचारियों को इस तरह के किसी कानून की जानकारी भी नहीं थी.

सर्वे का निष्कर्ष ये निकला कि हालांकि कार्यस्थल पर यौन शोषण रोकना असंभव नहीं है, फिर भी ज्यादातर कंपनियां इसको लेकर गंभीर नहीं हैं. इसलिए इसे पूरी तरह लागू कराने को लेकर उनके अंदर प्रतिबद्धता और इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है.

सर्वे के नतीजे सामने आने पर सरकार ने दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं करने वाली कंपनियों से सख्ती से निपटने की चेतावनी भी दी थी. लेकिन इसके बाद के सालों में इस तरह का कोई सर्वे नहीं हुआ, जिससे समझा जा सके कि वाकई कंपनियों ने सरकार की चेतावनी को गंभीरता से लिया भी है या नहीं.

बीते सालों में शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों ने यौन शोषण की शिकायतों के आंकड़े सार्वजनिक करने की शुरुआत की है. हालांकि इनमें काम कर रही औरतों के प्रतिशत और यौन शोषण को लेकर लचर सामाजिक रवैये को देखते हुए आसानी से समझा जा सकता है कि या तो महिलाएं अभी भी खुलकर सामने आने से कतराती हैं या फिर इस तरह की शिकायतों के निपटारे को लेकर कंपनियों का ढीला-ढाला रवैया जारी है.

मसलन, इस साल निफ्टी ने जिन 44 कंपनियों से मिले आंकड़ों का खुलासा किया है, उसमें 8 कंपनियों का दावा है कि बीते साल के दौरान उन्हें यौन शोषण की एक शिकायत भी नहीं मिली.

भारत में एक तिहाई महिला कर्मचारियों को विशाखा गाइडलाइन्स की जानकारी  नहीं है.
भारत में एक तिहाई महिला कर्मचारियों को विशाखा गाइडलाइन्स की जानकारी नहीं है.
फोटो:iStock

हाई प्रोफाइल मामलों के इंसाफ में देरी

पिछले कुछ सालों में यौन शोषण के कुछ हाई प्रोफाइल मामलों में को भी लें, तो नतीजे बहुत उत्साहवर्धक नजर नहीं आते. मसलन टेरी की आईसीसी ने जब पूर्व डायरेक्टर जनरल आरके पचौरी के खिलाफ हुई जांच को सही पाया, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. लेकिन मामले के अदालत में पहुंचते ही निपटारे की गति फिर से धीमी हो गई.

2015 की शुरुआत में सुर्खियों में आए इस मामले में पचौरी के खिलाफ दिल्ली की एक अदालत में आरोप पिछले हफ्ते तय किए जा सके हैं. इस पूरी अवधि में पचौरी एक बार भी गिरफ्तार नहीं हुए.

तहलका के पूर्व एडिटर इन चीफ तरुण तेजपाल के खिलाफ 2013 में सामने आए यौन उत्पीड़न के आरोपों पर चार्जशीट 2017 में दाखिल हो पाई. तेजपाल के रसूखदार वकीलों की काबि‍लियत के चलते मामले की सुनवाई शुरू होनी अभी भी बाकी है. इन मामलों में हालांकि आरोपियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा, लेकिन पीड़िताओं की 'अग्निपरीक्षा' भी अभी तक जारी है.

किसी भी कानून की सफलता सबसे पहली उसकी स्वीकार्यता पर निर्भर करती है. आम धारणाओं में बलात्कार से कम उत्पीड़न को यौन शोषण नहीं माना जाना इस कानून को कमजोर बनाता है. यौन शोषण के मामलों में साक्ष्यों के अभाव और उत्पीड़न साबित करने की जिम्मेदारी औरतों पर डालने जैसी मजबूरियां और सबसे अहम अपना करियर खत्म होने का डर पीड़िताओं की हिम्मत तोड़ने के लिए काफी होता है.

सोशल मीडिया पर मीटू की ताजा लहर ने औरतों की सामूहिक आवाज को फिर से हिम्मत दी है. ये सच है कि इसके बाद भी दफ्तरों में यौन शोषण पर तुरंत लगाम नहीं लग पाएगा. लेकिन ये पहल इस मामलों को लेकर संवेदनशीलता बढ़ाने की दिशा में एक ठोस कदम जरूर साबित होगी.

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