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राजस्थान चुनाव: बेहतर हिंदू कौन? BJP से मुकाबले में क्या कांग्रेस वोटर को समझा पाएगी?

कांग्रेस की मौजूदा रणनीति बीजेपी की उसे ‘हिंदू विरोधी’ के रूप में पेश करने की लगातार कोशिशों के चलते वोट बैंक खिसकने से रोकने की है.

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भारतीय जनता पार्टी (BJP) की ‘सबका साथ, सबका विकास’ की मनपसंद व्याख्या के बावजूद राजस्थान की मसूदा सीट (Rajasthan’s Masuda seat) पर प्रत्याशी बदलने का मामला भगवा ब्रिगेड का एक नया रंग दिखाता है. पार्टी नेता अभिषेक सिंह को मसूदा से अपना उम्मीदवार घोषित करने के बावजूद, सोशल मीडिया पर अफवाहें सामने आने के बाद कि वह हिंदू नहीं बल्कि मुस्लिम हैं, बीजेपी ने उनसे किनारा कर लिया.

हालांकि, अभिषेक सिंह का कहना है कि वह रावत-राजपूत हैं और हिंदू धर्म को मानते हैं, लेकिन बीजेपी ने अब वीरेंद्र कानावत को मसूदा से अपना उम्मीदवार बना दिया है.

बीजेपी ने इस प्रत्याशी परिवर्तन के लिए कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई, लेकिन मुस्लिम होने की अफवाहों पर अभिषेक सिंह को हटाना राजस्थान की 200 सीटों के लिए पूरी तरह एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं बनाने के पार्टी के फैसले से मेल खाता है.

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हिंदू-मुस्लिम बंटवारा बीजेपी की चुनावी रणनीति में सबसे अहम है

अपने हिंदुत्व के एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए मसूदा उम्मीदवार को बदलने के अलावा बीजेपी ने ध्रुवीकरण की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए जयपुर की हवा महल सीट (Jaipur’s Hawa Mahal seat) से भगवाधारी संत बाल मुकुंद आचार्य (Bal Mukund Acharya) को मैदान में उतारा है.

बीजेपी ने पुराने नेताओं को दरकिनार कर बाल मुकुंद को टिकट दिया, जबकि वह कभी पार्टी के सदस्य भी नहीं रहे. उनकी प्रसिद्धि की खास वजह जयपुर में हिंदू मंदिरों के रखरखाव के लिए हाल ही में अचानक शुरू किया गया एक अभियान है, जिनके बारे में उनका दावा है कि वे ‘तुष्टिकरण’ की राजनीति के कारण खंडहर हो गए हैं.

हवा महल सीट पर बड़ी मुस्लिम आबादी है और आचार्य को जयपुर के वाल्ड सिटी क्षेत्र में मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने के लिए उम्मीदवार बनाया गया है, जहां बीजेपी नेताओं द्वारा अक्सर जबरन हिंदू पलायन के आरोप लगाए जाते रहे हैं.

बीजेपी की तरफ से मैदान में उतारे गए हिंदुत्व के कट्टरपंथियों में सबसे ज्यादा चर्चा गोहत्या और सांप्रदायिक तनाव के लिए बदनाम मेवात क्षेत्र के मध्य में स्थित अलवर की तिजारा (Tijara) सीट से उम्मीदवार बाबा बालकनाथ की है.

अपनी आक्रामक छवि को चमकाने के लिए बालकनाथ खुद को ‘राजस्थान का योगी’ कहलाना पसंद करते हैं, उन्होंने बुलडोजर पर अपना नामांकन दाखिल किया और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनके लिए समर्थन जताने तिजारा आए. तिजारा में दो भगवा महंतों को एक साथ दिखाने वाले पोस्टर और होर्डिंग्स इस सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में बीजेपी की मंशा को दर्शाते हैं.

बाबा बालकनाथ ध्रुवीकरण के लिए तीखे तेवर अपनाते हैं. उन्होंने सीएम अशोक गहलोत पर “फतवा सरकार” चलाने का आरोप लगाया जो पूरी तरह से मुसलमानों के लिए काम करती है. कांग्रेस की तरफ से उनके खिलाफ मुस्लिम उम्मीदवार उतारे जाने पर बालकनाथ ने अपने चुनाव की तुलना ‘भारत-पाकिस्तान मैच’ से की है. एक वायरल वीडियो में वह दावा कर रहे हैं,

“इस बार यह भारत-पाकिस्तान का मैच है… वे ‘कबीले’ (जनजातियां) एकजुट हो गए हैं और हमें उनके मंसूबों को नाकाम करना है...ताकि भविष्य में वे कभी हमारे सनातन धर्म को हराने को एकजुट होने की साजिश रचने की हिम्मत न करें.”

हालांकि उन्होंने ‘कबीला’ के बारे में विस्तार से बताने से इन्कार कर दिया, लेकिन इसका संदर्भ मुस्लिम मतदाताओं से है, जिनके बारे में उनका दावा है कि वे एकजुट होकर वोट डालते हैं और बाबा हिंदुओं को पूरी तरह धार्मिक आधार पर वोट देने के लिए तैयार करना चाहते हैं.

जोर पकड़ चुका है राम मंदिर मुद्दा

बात सिर्फ कुछ उम्मीदवारों या स्थानीय नेताओं की नहीं है, ध्रुवीकरण की बयानबाजी पूरे राजस्थान में बीजेपी के प्रचार अभियान पर हावी है. राज्य के पश्चिमी हिस्से में केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत एक वायरल वीडियो में लोगों से बीजेपी को वोट देने का आग्रह करते हुए यह तर्क देते दिखाई दे रहे हैं- कंधों से बड़ी छाती नहीं होती, धर्म से बड़ी जाति नहीं होती. ये सनातन धर्म को बचाने का चुनाव है.”

सितंबर में बीजेपी के दिग्गजों के इस तरह के बयानों ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि पार्टी रेगिस्तानी राज्य में ‘परिवर्तन यात्रा’ चला रही है या ‘ध्रुवीकरण यात्रा.’

इसी तरह, पूर्वी राजस्थान में बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी एक वायरल वीडियो में दावा करते दिखाई दे रहे हैं कि पाकिस्तान राजस्थान चुनावों पर नजर रख रहा है. वह दावा करते हैं, “टोंक सीट पर लाहौर नजर रखे हुए है. हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि चुनाव के बाद लाहौर में लड्डू न बांटे जाएं.” उनका यहां तक दावा है कि हमास के आतंकियों की नजर आगामी चुनाव के नतीजों पर है.

लोकसभा में बीएसपी सांसद दानिश अली पर मुस्लिम विरोधी टिप्पणी के कुछ ही दिनों बाद बिधूड़ी को टोंक में बीजेपी का चुनाव प्रभारी बनाया गया, जहां सचिन पायलट कांग्रेस के उम्मीदवार हैं.

यहां तक कि बीजेपी के दिग्गज भी राज्य में सांप्रदायिक तनाव को लेकर गहलोत सरकार पर हमलावर हैं. कई घटनाओं का हवाला देते हुए, खासकर उदयपुर में कन्हैया लाल का सिर काटने, कुछ हिंसा प्रभावित शहरों में हिंदू त्योहारों पर पाबंदी और 2008 के जयपुर बम धमाका मामले में सभी आरोपियों को बरी किए जाने का हवाला देते हुए उन्होंने कांग्रेस पर ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ करने का आरोप लगाया.

पिछले हफ्ते एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कन्हैया लाल का सिर काटने की घटना को याद करते हुए दावा किया था, “कन्हैया लाल की हत्या राज्य सरकार पर एक बड़ा धब्बा है जो आतंकवादियों के साथ सहानुभूति रखती है.”

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बीजेपी नेता अपने प्रचार अभियान के केंद्र में अयोध्या में राम मंदिर को भी रख रहे हैं, जहां राम मंदिर का उद्घाटन समारोह अगले साल जनवरी में होगा. चुनावी जोड़-घटाने को देखते हुए बीजेपी नेता राजस्थान में लोगों को इस मुद्दे से जोड़ना चाहते हैं.

पीएम मोदी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह और यूपी के सीएम आदित्यनाथ तक सभी चुनावी रैलियों में राम मंदिर का मुद्दा उठा रहे हैं. अमित शाह ने दावा किया है कि राजस्थान इस साल तीन बार दीपावली मनाएगा, जनवरी में राम मंदिर के ‘प्राण प्रतिष्ठा’ समारोह पर तीसरा उत्सव होगा!

कांग्रेस के हिंदू समर्थक बयान बनाम बीजेपी का हिंदुत्व

बीजेपी का हिंदुत्व के मुद्दे पर मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश कोई नई बात नहीं है, मगर कांग्रेस की प्रतिक्रिया काफी नई और आश्चर्यजनक है.

सबसे पहली बात, कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष मुद्दों और गहलोत सरकार की कल्याणकारी योजनाओं पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जिसे वह अपनी जीत के मंत्र के रूप में देखती है. ‘तुष्टिकरण’ की राजनीति के आरोपों का जवाब देने के बजाय कांग्रेस चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना से लेकर पुरानी पेंशन योजना को फिर से लागू करने और पूरी वयस्क आबादी के लिए न्यूनतम गारंटी आय देने तक के अपने कामों को सामने रख रही है.

दूसरी बात, कांग्रेस जाति जनगणना के अपने वादे पर जोर दे रही है, जिससे उसे मंडल/कमंडल नैरेटिव को दोबारा खड़ा करने की उम्मीद है क्योंकि राजस्थान में बहुत से लोग आमतौर पर धर्म पर जाति को प्राथमिकता देते हैं. पिछले हफ्ते राहुल गांधी ने राज्य में चुनावी रैलियों को संबोधित करते हुए कहा कि अगर पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता में आती है तो राजस्थान में जाति सर्वेक्षण कराएगी.

जाति जनगणना का मुद्दा उठाकर, कांग्रेस धर्म को लेकर ध्रुवीकरण का मुकाबला करने के लिए खासतौर से यह वादा कर रही है कि वह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को उनकी आबादी के अनुपात में लाभ देगी.

ध्यान देने वाली बात यह है कि विवादास्पद रूप से ही सही, कांग्रेस भी धार्मिक प्रतीकवाद का अपना ब्रांड पेश कर बीजेपी के हिंदुत्व को नाकाम करने की कोशिश कर रही है. सीएम अशोक गहलोत मध्य प्रदेश के कमलनाथ की तरह बढ़-चढ़कर हिंदू होने का दिखावा नहीं कर रहे हैं, लेकिन वह अपनी सरकार द्वारा शुरू की गई हिंदू-अनुकूल योजनाओं को पेश करने में पीछे नहीं हैं. इनमें गायों के लिए गौशालाओं को बड़े अनुदान से लेकर राज्य भर के प्रमुख मंदिरों के नवीनीकरण और तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाओं पर करोड़ों रुपये खर्च करना शामिल है.

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हाल ही में, जब कांग्रेस ने अपनी ‘गारंटी यात्रा’ शुरू की, तो गहलोत और पार्टी के राज्य प्रभारी– सुखजिंदर सिंह रंधावा ने जयपुर के सबसे मशहूर गणेश मंदिर में पूजा की. इसी तरह, जब पार्टी के बड़े नेता चुनावी रैलियों के लिए आते हैं, तो वे खासतौर से स्थानीय मंदिरों में भी जाते हैं ताकि बीजेपी द्वारा कांग्रेस पर लगाए गए हिंदू विरोधी आरोप को खारिज किया जा सके. पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी ने डूंगरपुर जिले में एक जनसभा में ‘गायत्री मंत्र’ का जाप भी किया.

जाहिर है कि बहुत से उदारवादी इस नरम हिंदुत्व के ब्रांड से परेशान हैं. हालांकि पार्टी नेताओं का दावा है कि यह रणनीति बीजेपी के कांग्रेस के हिंदू विरोधी होने के लगातार लगाए जाने वाले आरोप की हवा निकाल रही है.

एकतरफा समर्थन

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस धार्मिक प्रतीकवाद को अपनाकर खुद को बीजेपी की तुलना में बेहतर हिंदू साबित करने का प्रयोग कर रही है. उदयपुर चिंतन शिविर और रायपुर प्लेनरी में 2019 की हार पर एके एंटनी की रिपोर्ट के बाद से, कांग्रेस ‘हिंदू विरोधी लेबल को कैसे हटाया जाए’ पर लगातार काम कर रही है.

कांग्रेस की मौजूदा रणनीति बीजेपी की उसे ‘हिंदू विरोधी’ के रूप में पेश करने की लगातार कोशिशों के चलते वोट बैंक खिसकने से रोकने की है. यह प्रयोग कितना कामयाब होता है, इसके अभी नतीजे आना बाकी है, लेकिन बीजेपी के बयानों पर कांग्रेस की रणनीतिक खामोशी और हिंदू प्रतीकवाद के रणनीतिक इस्तेमाल का मिश्रण एक अनूठी कोशिश लगती है.

जैसे-जैसे हिंदुत्व पर बहस गर्म होती जा रही है, अल्पसंख्यक मुद्दों और सवालों को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है. बीजेपी आक्रामक ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है, लेकिन किसी भी पार्टी ने यह सवाल नहीं उठाया कि बीजेपी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार क्यों नहीं खड़ा किया है, जबकि 2011 की जनगणना बताती है कि यह समुदाय राजस्थान की आबादी का 9 फीसद से अधिक है.

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इसी तरह, मुसलमानों को अक्सर सनकी हिंदुत्ववादियों द्वारा निशाना बनाया जाता है, मगर इस पर बहुत कम चर्चा होती है कि ज्यादातर मामलों में पीड़ितों को इंसाफ क्यों नहीं मिल पाता है. कन्हैया लाल की हत्या पर तीखी चुनावी बयानबाजी हुई, लेकिन इस साल गोरक्षकों द्वारा भरतपुर के दो मुसलमानों, नासिर और जुनैद को जलाकर मार डाला गया फिर भी इस बर्बर दोहरे हत्याकांड का शायद ही जिक्र किया जा रहा है.

फिलहाल, राजस्थान की चुनावी लड़ाई में ध्रुवीकरण की राजनीति एक प्रमुख मुद्दा बनी हुई है. जहां बीजेपी अपनी मुख्य अभियान रणनीति के रूप में आक्रामक ध्रुवीकरण पर भरोसा कर रही है, वहीं कांग्रेस भी धार्मिक हथकंडों से बहुसंख्यक आबादी को लुभाने के लिए हिंदू प्रतीकवाद की रणनीति पर काम कर रही है. यह अलग बात है कि कांग्रेस की कल्याणकारी योजनाएं और गरीब-समर्थक योजनाएं उसका प्रमुख मुद्दा बनी हुई हैं.

यह साफ नहीं है कि अंत में किस नैरेटिव की जीत होगी, लेकिन 3 दिसंबर को चुनावी नतीजे शायद कुछ जरूरी सबक दे जाएंगे जो अगले साल के लोकसभा चुनावों में भी फायदेमंद हो सकते हैं.

(लेखक एक अनुभवी पत्रकार और राजस्थान की राजनीति के विशेषज्ञ हैं. NDTV में रेजिडेंट एडिटर के रूप में काम करने के अलावा, वह जयपुर में राजस्थान विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्रोफेसर रहे हैं. वह @rajanmahan पर ट्वीट करते हैं. यह लेखक के निजी विचार हैं. द क्विंट न तो इसका समर्थन करता है न ही इसके लिए जिम्मेदार है.)

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