बजट 2021: वित्तमंत्री जी इस ‘आर्थिक विधर्मी’ की सुनिए,टैक्स घटाइए!

सीतारमण टीवी पर सभी और अलग-अलग वर्ग के लोगों से उनके साहसिक विचार मांग रही हैं

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सीतारमण टीवी पर सभी और अलग-अलग वर्ग के लोगों से उनके साहसिक विचार मांग रही हैं
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मैं सोचता हूं कि क्या कभी प्रोफेसर आर्थर लैफर मुंबई आए थे या महाराष्ट्र में शिवसेना के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार की पसंदीदा भाषा मराठी की कुछ भी जानकारी उन्होंने हासिल की थी? मैं मानता हूं कि मेरे इस असामान्य सवाल का जवाब ना और सिर्फ ना होगा लेकिन इसके साथ ही मैंने आपकी जिज्ञासा को इतना तो बढ़ा ही दिया होगा कि आप ये सवाल करेंगे कि ये व्यक्ति करना क्या चाहता है, क्या वो अपने होश में है?

इसलिए मुझे अपनी बात को विस्तार से बताने दीजिए.

प्रोफेसर आर्थर लैफर एक प्रसिद्ध अमेरिकी सप्लाई चेन अर्थशास्त्री है जो येल, स्टैनफोर्ड, रोनाल्ड रीगन और डोनल्ड ट्रंप के साथ भी काम कर चुके हैं. 1974 की एक शाम वो वाशिंगटन होटल के टू कंटिनेंट्स रेस्तरां में डिक चेनी, डोनल्ड रम्सफेल्ड और जूड वानिस्की के साथ डिनर कर रहे थे. लैफर को अपना ऐतिहासिक भाषण याद नहीं है लेकिन वानिस्की का कहना है कि लैफर ने नैपकिन पर एक टेढ़ा-मेढ़ा घंटाकार वक्र (डिस्टॉर्टेड बेल कर्व) बनाया अपने दर्शकों को ये समझाने के लिए कि राष्ट्रपति जीराल्ड फोर्ड की टैक्स बढ़ोतरी सफल नहीं हो पाएगी. क्योंकि, एक सीमा के बाद कर दरों में वृद्धि होने पर भी राजस्व गिर जाता है.

लैफर की 'नैपकिन थ्योरी' कैसे मशहूर हुई?

लैफर की नैपकिन थ्योरी न ही सबसे अलग थी और न ही ये उनकी अपनी थ्योरी थी. इस्लामी विद्वान इब्न खल्दून ने मुकद्दिमाह में 600 साल पहले ये सिद्धांत दिया था. बाद में एडम स्मिथ, जॉन मेनर्ड केयंस और एंड्रीयू मेलन जैसे बड़े विद्वानों ने इसका समर्थन किया था. लेकिन उस शाम ये थ्योरी प्रोफेसर लैफर के नाम हो गई.

“अगर ब्याज दर कम कर दिए जाएं तो टैक्स रेवेन्यू बढ़ सकते हैं” इसको लैफर कर्व के नाम से जाना जाने लगा क्योंकि राष्ट्रपति रीगन ने लैफर की सलाह पर एक करिश्माई बदलाव करते हुए 1981 में अधिकतम टैक्स को 70% से घटाकर 28% कर दिया था.

कई विद्वानों ने लैफर कर्व का खंडन किया है लेकिन इससे रूढ़ीवादी नेताओं के लिए इसका आकर्षण कम नहीं हुआ है -क्या आपको डोनाल्ड ट्रंप की 21% तक की बड़ी कटौती याद है?

लैफर कर्व से मुंबई के प्रॉपर्टी मार्केट में आई जान

अब तक सब अच्छा है, लेकिन आमची मुंबई और लैफर कर्व के बीच क्या पक रहा है? खैर, अगर प्रोफेसर लैफर अपने सिद्धांत के लिए शानदार उदाहरण ढूंढ रहे थे तो उन्हें ये महानगर के प्रॉपर्टी बाजार में मिल गया है. 26 अगस्त 2020 को मुंबई पर राज करने वालों ने वो किया जो कुछ ही लोक हितकारी भारतीय सरकारें करती हैं यानी उन्होंने कोविड के कारण बेजान रीयल एस्टेट मार्केट में जान फूंकने के लिए प्रॉपर्टी ट्रांसफर पर स्टांप ड्यूटी को कम कर दिया. 31 दिसंबर 2020 तक के लिए इस दर को बेरहमी से 5% से घटाकर 2% कर दिया गया. इसका असर जादुई था:

  • नवंबर 2019 की तुलना में नवंबर 2020 में मुंबई में घरों की बिक्री में 67% का उछाल आया. पिछले नौ साल में ये नवंबर में हुई सबसे ज्यादा बिक्री थी. क्या मंदी, कैसी गिरावट? कहां है कोविड-19?
  • बिक्री बढ़ने से उत्साहित बिल्डर्स ने छूट, मुफ़्त उपहार, डिफर्ड पेमेंट प्लान और दूसरी चीजों को रोक लिया.
  • दिसंबर में स्टांप/रजिस्ट्रेशन से कमाई पिछले साल की तुलना में करीब 60% - जी हां 60 फीसदी बढ़कर 2700 करोड़ से 4300 करोड़ हो गई. रजिस्टर किए गए कुल दस्तावेजों की संख्या बढ़कर 92% हो गई.

राज्य के वित्त मंत्री इसका श्रेय लेने से खुद को नहीं रोक पाए: “इससे हमारी अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर लौट आई है. चार महीनों में रजिस्ट्रेशन 48% और राजस्व में पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 367 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है.’’

उन्होंने इसे कई शब्दों में नहीं कहा लेकिन क्या मंदी, कैसी गिरावट? कहां है कोविड-19? 

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को कुछ “आर्थिक विरुद्ध मतों” पर क्यों ध्यान देना चाहिए?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण टीवी पर सभी और अलग-अलग वर्ग के लोगों से उनके साहसिक विचार मांग रही हैं क्योंकि उनके शब्दों में “ये केंद्रीय बजट 100 साल में सबसे अहम बजट होने वाला है.” मैं इससे पूरी तरह से सहमत हूं. कोमा में पड़ी अर्थव्यवस्था को फिर से जगाना बहुत जरूरी है. लेकिन उन्हें जो आइडिया मिल रहे हैं वो ज्यादातर एक जैसे हैं.

  • सुपर रिच और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस टैक्स पर वृद्धि/सरचार्ज लगाना (छी, कृपया इससे बचिए!)
  • भारतीय उद्योगों को ज्यादा आत्मनिर्भरता देने के लिए कस्टम ड्यूटी को बढ़ाया जाए
  • किफायती आवास पर ब्याज में थोड़ी और आर्थिक सहायता दीजिए
  • हेल्थकेयर और बुनियादी ढांचे के विस्तार पर ज्यादा खर्च
  • कुछ और सरकारी कंपनियों के शेयर बेचना
  • मुश्किल में आए कुछ बैंकों को फिर से पूंजी देना, आदि, आदि, आदि
  • और परेशान न हो अगर राजकोषीय घाटा कुछ बेसिस प्वाइंट कुछ और कम हो जाए

संक्षेप में कहें तो प्रिय मंत्री जी, थोड़ा आक्रामक होइए, लेकिन आजमाए हुए, परखे हुए और उबाऊ तरीकों पर ही चलिए.

मैं इससे पूरी तरह असहमत हूं.

ये अलग तरह से सोचने का वक्त है, और शायद प्रोफेसर आर्थर लैफर को ताज कोलाबा के रेड ड्रैगन रेस्तरां में डिनर पर इस उम्मीद में आमंत्रित करने का कि वो नैपकिन पर एक और बेल कर्व बनाएंगे.

हां, ये टैक्स कम करने का वक्त है

अर्थव्यवस्था फिलहाल 8% पर सिमट गई है लेकिन अगले साल ये 10% की रफ्तार से बढ़ेगी, ये वित्त वर्ष 19-20 के मूल्यों को फिर से हासिल कर लेगी. वास्तव में वित्त वर्ष 21-22, वित्त वर्ष 19-20 जैसा ही हो सकता है. इसलिए अगर हम उस वर्ष की वास्तविक संख्या पर काम करते हैं तो हम अगले साल के आंकड़ों को लेकर काफी सटीक हो सकते हैं.

  • केंद्र सरकार ने उस साल कॉरपोरेट, पर्सनल इनकम, जीएसटी और एक्साइज टैक्स के जरिए करीब 20 लाख करोड़ रुपये जुटाए थे (सरकार ने कस्टम ड्यूटी से भी 1.25 लाख करोड़ कमाए थे लेकिन घरेलू मांग को बढ़ाने के स्पष्ट कारणों के लिए, मैं इस कर में कटौती की वकालत नहीं कर रहा हूं). करीब 6.50 लाख करोड़ रुपये राज्यों को देने के बाद केंद्र सरकार ने 13.50 लाख करोड़ अपने पास रखे. जिस तरह महाराष्ट्र सरकार ने स्टांप ड्यूटी में 60% की कटौती की, वैसे ही क्या होगा अगर केंद्र सरकार वित्त वर्ष 21-22 में 50% टैक्स कटौती का एक बार में/एक साल के लिए एलान कर दे यानी सैद्धांतिक तौर पर 6.75 लाख करोड़ या जीडीपी का करीब 3% की मांग को बढ़ावा देना?
  • प्राइवेट कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (निजी खपत खर्च) को ये कितना बढ़ावा देगा, चूंकि सबकुछ, घर से लेकर कार, शराब से लेकर कपड़े और जिम के सामान तक हर चीज काफी सस्ती हो जाएगी. मैं सटीक प्रतिशत का अनुमान नहीं लगाऊंगा, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि मुंबई के प्रॉपर्टी बाजार में टैक्स कटौती की प्रतिक्रिया को बेंचमार्क मानते हुए बढ़ी हुई मांग से अर्थव्यवस्था में 10-20 लाख करोड़ रुपये आ सकते हैं.
  • मांग में इतनी बड़ी उछाल से केंद्र सरकार को अवश्य ही 1-2 लाख करोड़ के अतिरिक्त टैक्स की कमाई हो जाएगी जिससे टैक्स में छूट का आकार छोटा हो जाएगा, जैसा कि लैफर कर्व निजी खपत खर्च में असाधारण बढोतरी की शुरुआत करता है. इसलिए अतिरिक्त राजकोषीय घाटा (जैसे सरकार की ओर से मांग प्रोत्साहन) जिससे हमारे परंपरागत नीति निर्माताओं को डर लगता है, वो 'धर्म विरुद्ध' 3% से गिरकर जीडीपी का 1-2 % गिर सकता है. किस्मत भी बहादुर लोगों का ही साथ देती है- एक बड़ा खतरा उठाने की हिम्मत करके, खतरा खुद ब खुद खत्म हो जाएगा. ये एक सरकारी नीति की सुंदरता है जो उद्यमशील है.

निष्कर्ष निकालने के लिए:

प्रिय वित्त मंत्री सीतारमण जी, ये परंपरागत, हठधर्मी, डर और गतिरोध को दूर करने का समय है. हर संभव कोशिश कीजिए. 'आर्थिक विधर्मी' मत को सुनिए. टैक्स में कटौती कीजिए. हां, मैं प्रभाव को ज्यादा बता रहा हूं लेकिन सिद्धांत ऐसे नहीं हैं जो टूट न सकें. अगर 50% आपके लिए थोड़ा ज्यादा है तो 33 % की कटौती के साथ शुरुआत कीजिए. अगर आप सुरक्षा का दोहरा उपाय करना चाहते हैं तो सिर्फ छह महीनों के लिए इसे आजमाएं (लोन मोराटोरियम की तरह), पूरे साल के लिए नहीं. लेकिन आगे जरूर बढ़ें, कुछ नया करें और खुद को खुश करें.

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