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‘आदरणीय भक्तों’, किस तरह का हिंदू राष्ट्र बनाना चाह रहे हैं?

हिंदू राष्ट्र बनाने की बातें जो अब तक चुपचाप होती थी अब वो खुलकर सामने आ गई है

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हिंदू राष्ट्र बनाने की बातें जो अब तक चुपचाप होती थी अब वो खुलकर सामने आ गई है. तो मैंने सोचा कि क्यों न मैं भी इस मुहिम से जुड़ जाऊं. इसके लिए मेरा बायोडेटा भी तगड़ा है. शिव जी का भक्त हूं. माथे पर तिलक लगाने में गर्व महसूस करता हूं.

स्कूल जाने से पहले ही गायत्री मंत्र सीख गया था. बचपन में ही पिताजी का आदेश था कि दुर्गा पूजा के हरेक 9 दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करना है. दादाजी ने ‘नमामी शमीशान निर्वाण रुपम’ सिखाया था, जो मेरा पसंदीदा श्लोक है. मतलब नहीं पता है लेकिन सुनने में बहुत शुकून मिलता है.

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इतने तगड़े सीवी के साथ मुहिम से जुड़ना तो बनता है. लेकिन मेरे कुछ सवाल हैं जिनका निपटारा तो होना ही चाहिए.

पुरुष सुक्त के हिसाब से किस वर्ण को प्राथमिकता मिलेगी?

सबसे पहला सवाल है कि किस तरह का हिंदू राष्ट्र हमें बनाना है? सुना है कि ऋगवेद के पुरुष सुक्त में लिखा है ब्राह्मणों की उत्पत्ति प्रथम पुरुष के माथे से हुई है, क्षत्रियों की भुजा से, वैश्यों की जंघा से और शूद्रों की पैर से. बनने वाला हिंदू राष्ट्र इसी ऑर्डर को मानेगा? तो फिर पैर से निकले लोगों को सम्मान कैसे दिलाया जाएगा? फिर उनका क्या जिनको दलित और आदिवासी कहा जाता है और जो वर्ण व्यवस्था से बाहर हैं? उनके सम्मान का क्या?

भारतीय संविधान ने सबको सम्मान दिलाया. लेकिन क्या हिंदू राष्ट्र में सब कुछ उलट कर पुरानी वर्ण व्यवस्था लागू की जाएगी? पूछना जरूरी है कि क्यों किसी ‘आदरणीय भक्त’ ने इसका समाधान नहीं बताया है. आजाद भारत में हम पुरानी बंदिशों को कहीं पीछे छोड़ गए है. क्या फिर से उन्ही बंदिशों को वापस लाया जाएगा?

अर्बन नक्सल और टुकड़े-डुकड़ें गैंग का क्या होगा?

मेरा दूसरा सवाल ‘अर्बन नक्सल’ और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से जुड़ा है. इस तरह के तमगे देश में जिस तरह के लोगों को दिए जा रहे हैं, उससे साफ है कि उस टाइप के लोगों के माइंड चिप में एक ‘विरोध का वायरस’ घुस गया है. स्कूल-कॉलेजों के सिलेबस में पढ़ाए जाने वाले कार्ल मार्क्स, राम मनोहर लोहिया, महात्मा गांधी और बी आऱ अंबेडकर के विचारों को इन्होंने गंभीरता से पढ़ लिया है. या फिर ये लिबरेलिज्म के वायरस के शिकार हैं.

अब देखिए. अस्सी के दशक तक तब का सोवियत संघ हमारा सबसे करीबी साथी देश था. वहां की छपी शानदार किताबें हमें आसानी से और सस्ते दामों में उपलब्ध हो जाया करती थीं. साथ ही प्रेमचंद, लोहिया, अंबेडकर की रचनाओं से हमारा खूब वास्ता पड़ता था. वो सब आज होते तो ‘अर्बन नक्सल’ ही कहलाते. लेकिन देश के सभी छात्रों के लिए उनकी रचनाएं पढ़ना तो जरूरी है. पाठ्यक्रम का जो हिस्सा है. सीरियसली पढ़ लिया तो मतभेद का कीड़ा दिमाग में घुस गया.

लेकिन अब वो ‘अर्बन नक्सल’ की कैटेगरी में आ गए हैं. इनकी तादाद करोड़ों में है. इनकी उपस्थिति भी कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर जगह फैली है. सम्माननीय भक्तों, हिंदू राष्ट्र में इनका क्या होगा? वोटिंग राइट्स छिन जाएंगे या इनको डिटेंशन सेंटर भेजा जाएगा? जरा सोचकर जवाब दीजिएगा. इस तरह के वायरस को लेकर घूम रहे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है.

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हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों की भूमिका

मेरा तीसरा सवाल मुसलमानों को लेकर है. 18 करोड़ आबादी वाले इस ग्रुप की हिंदू राष्ट्र में क्या भूमिका होगी? पाकिस्तान या डिटेंशन सेंटर भेजा जाएगा? या फिर इनके सारे मौलिक अधिकार छीन लिए जाएंगे?

धर्म के आधार पर भेदभाव छोटे-छोटे इलाके में दुनिया के हर कोने में हुए हैं. लेकिन इतने बड़े पैमाने पर शायद कहीं नहीं. क्या ये संभव है? आप तो कहेंगे कि सब मुमकिन है. लेकिन ध्यान से सोचिएगा.

आजादी के बाद संविधान के सहारे हमने एक लंबी दूरी तय कर ली है. सबको नकारकर एक नए रास्ते को चुनना जिसमें किसी खास धर्म या जाति के ही लोग नहीं हैं, ऐसे हिंदू राष्ट्र को बनाना जरूरी है क्या? या ये सब पावर पॉलिटिक्स है और हम सब इसके मोहरे हैं जो बिना कुछ सोचे समझे बह हो हो करते जा रहे हैं?

ध्यान रहे कि अगर एक धर्म, एक राष्ट्र की परिकल्पना सही है तो पाकिस्तान से सुखी और संपन्न देश और कोई नहीं होता. वहां तो सारी विविधता को धीरे-धीरे खत्म करने की कोशिश की जा रही है. जो प्रयोग पाकिस्तान में फेल हो गया वो अपने देश में चल जाएगा क्या?

(मयंक मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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