क्या चुनाव आयोग अपनी बेबसी और निष्क्रियता का संज्ञान लेगा?
ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब चुनावों के वक्त नेताओं के बोल बिगड़े हों और चुनाव आयोग बेबस नजर आया हो
ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब चुनावों के वक्त नेताओं के बोल बिगड़े हों और चुनाव आयोग बेबस नजर आया हो(फोटो: PTI)

क्या चुनाव आयोग अपनी बेबसी और निष्क्रियता का संज्ञान लेगा?

चुनाव आयोग एक्शन में तब आया जब सुप्रीम कोर्ट ने उसकी ‘एडवाइजरी’ पर सवाल उठाए. अगर चुनाव आयोग ने यही एक्शन तब दिखाए होते जब 2019 में चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद पहली बार योगी आदित्यनाथ ने इसका उल्लंघन किया था, तो सम्भवत: वह दूसरी बार ऐसी हरकत नहीं करते. चुनाव आयोग ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार को भी दोषी ठहराने के बावजूद बख्श दिया. उसके बाद से आचार संहिता तोड़ने की स्पर्धा सी चल पड़ी.

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राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने भी चुनाव आचार संहिता का सरेआम उल्लंघन किया, जब उन्होंने कहा, “हम सब बीजेपी के कार्यकर्ता हैं और हम सब चाहते हैं कि चुनाव में बीजेपी जीते.” 

आयोग ने इस बयान को गलत करार दिया और मामले को राष्ट्रपति के पास भेज दिया. अगर 90 के दशक वाली नैतिकता भी जिन्दा होती तो कल्याण सिंह ने भी हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल गुलशेर अहमद की तर्ज पर अपने पद से इस्तीफा दे दिया होता. तब आयोग ने बेटे का चुनाव प्रचार करने पर गुलशेर अहमद की आलोचना की थी.

अब ताजा मामले पर गौर करें. योगी आदित्यनाथ को अली और बजरंगबली वाले जिस बयान के लिए आयोग ने दोषी ठहराते हुए 72 घंटे तक चुनाव प्रचार से दूर रहने का फैसला सुनाया है, वह बयान बीएसपी प्रमुख मायावती के बयान की प्रतिक्रिया में दिए गये थे. मायावती ने देवबंद में मुसलमानों से एकजुट होकर महागठबंधन के लिए वोट की अपील की थी. इस गुस्ताखी के लिए मायावती को 48 घंटे तक चुनाव प्रचार से दूर रहने का हुक्म सुनाया गया है.

मध्यप्रदेश के चुनाव में भी गूंजा था अली-बली

आप याद करें तो यही वाकया 2018 में मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान देखने को मिला था. तब योगी आदित्यनाथ ने यही ‘अली और बजरंगबली’ वाला बयान पहली बार दिया था. उस वक्त कांग्रेस के कद्दावर नेता कमलनाथ जो अब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, के बयान की प्रतिक्रिया थी. कमलनाथ तब एक समुदाय विशेष से 90 फीसदी मतदान सुनिश्चित करने को कहते हुए कैमरे में कैद हुए थे. बात इससे बढ़ती चली गयी थी. बजरंग बली की जाति और धर्म तक नेता बिना किसी डर-भय के बोलते रहे.

अगर चुनाव आयोग ने 2018 में ही सख्ती दिखाई होती. कमलनाथ और योगी आदित्यनाथ दोनों को दंडित किया होता, तो आज मायावती और योगी वही कहानी दोहरा नहीं रहे होते.

यह माना जा सकता है कि कि राजनेताओं को नैतिकता चुनाव आयोग नहीं सिखा सकता. मगर, आचार संहिता के दायरे में बांधकर रखने का अधिकार तो चुनाव आयोग को है. वह इसमे संकोच क्यों दिखाता रहा है? योगी आदित्यनाथ सिर्फ बीजेपी के स्टार प्रचारक नहीं हैं. वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हैं. यह तो शुक्र है कि योगी के बयान की क्रिया-प्रतिक्रिया का कोई भयानक रूप देखने को नहीं मिला अन्यथा आयोग के लिए दोषियों को चिन्हित करना मुश्किल हो जाता.

जिस मामले में दोषमुक्त होकर भी सजा से बच गए योगी आदित्यनाथ, उस मामले में ध्यान दीजिए कि योगी का बयान भारतीय सेना को लेकर कितना आपत्तिजनक था, “कांग्रेस के लोग आतंकवादियों को बिरयानी खिलाते थे और मोदीजी की सेना आतंकवादियों को गोली और गोला देती है.”

नेताओं पर नहीं रहा चुनाव आयोग का खौफ

पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने इस घटना के बाद चुनाव आयोग के लिए जो प्रतिक्रिया दी थी, उससे पता चल जाता है कि आयोग को लेकर नेताओं में कितना खौफ रह गया है,

वीके सिंह ने कहा,“चुनाव आयोग तो 100 चीजों के लिए नोटिस देता है.’’

जब चुनाव आयोग ने दोषी मानते हुए भी योगी आदित्यनाथ और योजना आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार को चेतावनी भर देकर छोड़ दिया, तो ऐसा लगा मानो जनरल वीके सिंह सही कह रहे थे. मगर, सवाल ये है कि क्या अब चुनाव आयोग का रुख बदल जाएगा? क्या चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट से सख्त निर्देश का इंतजार था?

कई मामलों में बेबस और निष्क्रिय दिखा है चुनाव आयोग

चुनाव आयोग को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू के काफिले से 1.8 करोड़ रुपये नकदी नोट मिले थे. कांग्रेस का आरोप है कि इन पैसों का इस्तेमाल नरेंद्र मोदी की रैली में होना था. इस मामले में भी कार्रवाई को लेकर चुनाव आयोग अब तक सामने आने की हिम्मत नहीं दिखा पाया है.

कर्नाटक के चित्रदुर्ग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हेलिकॉप्टर से काले रंग के बक्से उतरने और उन्हें निजी वाहनों में ढोने का आरोप भी कांग्रेस लगा रही है. इसके विजुअल देखे गए हैं. इस मामले में चुनाव आयोग ने कोई कदम नहीं उठाया है, यह आश्चर्यजनक है. हो सकता है कि इस घटना में कोई दूसरी कहानी ही हो. मगर, विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए आयोग को तुरंत सक्रिय होने की जरूरत थी.

भोपाल में मुख्यमंत्री के करीबियों के घर छापेमारी हुई. करोड़ों रुपये बरामद होने से लेकर उनके विजुअल्स तक कुछ घंटों के भीतर ही चलने लगे. मतदान से ठीक दो दिन पहले ऐसी घटनाओं के पीछे जो बातें छिपी होती हैं उस पर चुनाव आयोग कतई ध्यान नहीं दे रहा. सत्ताधारी दल ने इस घटना में भी चुनावी संदेश खोज निकाला और चुनाव आयोग देखता रह गया.

...अब भी वक्त है

अभी पहले चरण का मतदान हुआ है और आगे 6 चरण सामने हैं मगर ईवीएम को लेकर जो शिकायतें आ रही हैं उन्हें सुनने के बजाय चुनाव आयोग शिकायतकर्ता राजनीतिक दल से ही पूछ रहा है कि अमुक ‘दागी’ व्यक्ति आपके साथ क्यों दिख रहा है? शिकायत सुनने की क्या यही आचार संहिता होती है?

चुनाव आयोग ने परिस्थितिवश कार्रवाई करके विभिन्न घटनाओं में अपनी बेबसी और निष्क्रियता को नए सिरे से बहस के केन्द्र में ला दिया है. चुनाव आचार संहिता के टूटने की घटनाएं तो अस्वाभाविक नहीं हैं, लेकिन इसे रोकने के बजाय आंखें मूंद लेने की घटनाएं जरूर अस्वाभाविक हैं.

क्या चुनाव आयोग खुद का संज्ञान लेगा? चुनाव आयोग में जो अंदरूनी ताकत है और जो ताकत देश की राजनीतिक व्यवस्था बदल सकती है, उसे सबसे पहले टीएन शेषण ने पहचाना था. आज लाचार दिख रहा चुनाव आयोग देश को उन्हीं की याद दिला रहा है.

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(प्रेम कुमार जर्नलिस्‍ट हैं. इस आर्टिकल में लेखक के अपने विचार हैं. इन विचारों से क्‍व‍िंट की सहमति जरूरी नहीं है.)

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