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World Mental Health Day: मेंटल हेल्थ कितना जरूरी, दुख और ट्रॉमा से कैसे उबरें ?

World Mental Health Day: दुख कई तरह के होते हैं. किसी को खोने के दुख, कलंक, साहस और हीलिंग की कुछ कहानियां

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फिट
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World Mental Health Day: मेंटल हेल्थ कितना जरूरी, दुख और ट्रॉमा से कैसे उबरें ?
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(ट्रिगर चेतावनी: यौन शोषण का नॉन-ग्राफिक उल्लेख)

(यदि आप या आपका कोई परिचित संकट में है, तो कृपया उनकी ओर दया के साथ सहायता का हाथ बढ़ाएं और लोकल इमर्जेन्सी सेवाओं, हेल्पलाइन और मानसिक स्वास्थ्य NGO नंबरों पर कॉल करें.)

"हर दिन जब आप जागते हैं, तो आपका पूरा दिन आपके सामने होता है, और उस समय जो आप अनुभव कर रहे होते हैं उसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल होता है," रुई कहती हैं.

जब किसी करीबी इंसान की मृत्यु हो जाती है, तो ऐसा लगता है कि वे आप का एक टुकड़ा अपने साथ ले जाते हैं, और वे एक खाली जगह छोड़ जाते हैं, जो हमेशा आपके साथ रह जाता है. इस प्रकार रुई अपने पिता के निधन का वर्णन करती हैं.

मृत्यु के साथ दुःख, पीड़ा और शोक का अनुभव होता है. यह अल्पकालिक या लंबे समय तक हो सकता है, हो सकता है आप इसे मैनेज कर पाएं यह फिर यह ‘सोल क्रशिंग’ साबित हो. एक बात पक्की है, इस समय लगभग हमेशा अकेलापन महसूस होता है, जिसमें स्टिग्मा, टैबू और 'सोशली एक्सेप्टेबल' तरीके से शोक करने का दबाव होता है.

इस वर्ल्ड मेंटल हेल्थ दिवस पर हम दुःख, स्टिग्मा और प्रियजनों को खोने से हीलिंग की कहानियां लेकर आए हैं. फिट ने एक्स्पर्ट्स से भी बात की जो दुख की साइकोलॉजी समझते हैं, और दुख से डील करने के सही तरीके बताते हैं.

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महामारी के कारण, विशेष रूप से पिछले दो वर्षों में, बहुत लोगों की मौत हुई है. लाखों लोगों ने अपने प्रियजनों को वायरस या किसी संबंधित कारण से खो दिया और वे अभी भी उनका शोक मना रहे हैं.

रुई ने भी, फरवरी 2022 में, अपने पिता को खो दिया.

जीवन पर एक पैरेंट को खोने का प्रभाव

रुई बताती हैं, "वह डेढ़ महीने से अस्पताल में भर्ती थे."

पुणे की रहने वाली 26 वर्षीय शिक्षिका कहती हैं, ''मैं उनसे सुबह मिली और फिर मैं घर चली गयी और तभी मुझे मां का फोन आया”.

"पहले तो मैं बिल्कुल ब्लैंक हो गई. अगले कुछ दिन मैं बस, बिना सोचे या स्वीकार किए, उन रिचुअल का पालन कर रही थी जो उस समय किए जाते हैं."
रुई, 26, शिक्षक

हाल ही में मुझे लगा कि मैं बेहतर कर रही हूं, लेकिन फिर त्योहारों का मौसम शुरू हो गया, और यह मेरे परिवार के लिए इतना खुशी का समय हुआ करता था. यह यादें और सभी भावनाओं को ट्रिगर करता है.

(फोटो: अरूप मिश्रा/फिट हिंदी)

माता-पिता को खोने का दुख किसी बड़े व्यक्ति के लिए भी उतना ही कठिन हो सकता है.

57 वर्षीय गीता कहती हैं, "मेरी मां 82 साल की थीं, जब उनका निधन हो गया. उन्हें दिल की बीमारी थी...मैं बस फ्रीज कर गई, और सुन्न हो गई."

"मैं अभी भी काम करती हूं, जिससे मन थोड़ी देर के लिए उस बात से हट जाता है. लेकिन कई बार मैं रोना शुरू कर देती हूं. छोटी-छोटी चीजें मुझे मां की याद दिलाती हैं - जैसे कि जब मैं काम से घर वापस आती हूं, या जब मैं सोचती हूं कि रात के खाने में क्या बनाया जाए. मुझे नहीं पता कि इससे कैसे निपटना है. मैं अपनी बेटी से बात करती हूं लेकिन मुझे नहीं पता कि मैं ऐसा क्यों और कैसे महसूस करती हूं."
गीता, 57

गीता ने कहा, "मैं गिल्टी महसूस करती हूं, जैसे मुझे और ध्यान देना चाहिए था कि जब उसने झपकी ली और मुझे पता चलना चाहिए था कि कुछ गड़बड़ है. मुझे पता है मैं ऐसा नहीं कर सकती थी, लेकिन मैं अभी भी गिल्टी महसूस करती हूं और मैं इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रही हूं"

(फोटो: अरूप मिश्रा/फिट हिंदी)

'मुझे अपने करीबी परिवार वालों के साथ संबंध तोड़ना पड़ा'

"जब आप शोक कर रहे होते हैं, तो आप न केवल उस व्यक्ति के लिए शोक करते हैं, जो गुजर गया, बल्कि अपने लिए भी शोक कर रहे होते हैं - आप उस व्यक्ति के साथ कैसे थे, और जैसा उनके बिना अब आप नहीं हो सकते", ट्रेलिस फैमिली सेंटर, मुंबई में मनोचिकित्सक डॉ रुक्शेदा सायीदा कहती हैं.

"अचानक एक खालीपन आ जाता है, न केवल आपके वर्तमान में, बल्कि आपके भविष्य में भी. 'हम इस व्यक्ति के बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?' जैसे सवाल आपके मन में उठने शुरू हो जाते हैं."
डॉ रुक्शेदा सायीदा
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इस प्रकार का दुख किसी करीबी के मरने से, या फिर किसी रिश्ते के खत्म हो जाने से भी हो सकता है, बैंगलोर स्थित एक नैरेटिव थेरपिस्ट मोहना बैद्य कहती हैं.

"सामाजिक, भावनात्मक या वित्तीय मामले में व्यक्ति जितना आपके करीब होगा, उसे खोने का दुख उतना ही जटिल होगा."

2020 में, महामारी के बीच, 25 वर्षीय अंबरीन (बदला हुआ नाम) ने वर्षों तक इमोशनल ट्रॉमा का अनुभव करने के बाद अपने परिवार के साथ सभी संबंध तोड़ देने का फैसला लिया.

"मेरे माता-पिता हमेशा मुझ पर नियंत्रण रखने की कोशिश करते थे और नार्सिसिस्टिक पैटर्न दर्शाते थे. मैं अपनी तरह से जीने के लिए संघर्ष कर रही थी और मुझे हमेशा एक्यूट एंग्जाइटी रहती थी."

जब उसने अपने माता-पिता को बताया कि उसके भाई ने, जो उससे 8 साल बड़ा था, बचपन में उसका यौन शोषण किया था, तो उन्होंने उस पर विश्वास नहीं किया और उसके भाई का पक्ष लिया.

"उनके रिएक्शन ने मेरा दिल तोड़ दिया. वह स्थिति भयानक थी और उससे मुझे एहसास हुआ कि केवल मैं ही खुद को बचा सकती हूं और मुझे अपने परिवार से खुद को दूर करना होगा, अगर मैं आगे बढ़ना चाहती हूं," अंबरीन कहती हैं,

"मैं हमेशा से जानती थी कि ऐसा दिन आएगा और मुझे खुद को बचाना होगा. यह दिल दहला देने वाली घटना थी और आज भी है."
अंबरीन (बदला हुआ नाम)

अंबरीन ने कहा "मैं एक बड़े परिवार में पली बढ़ी हूं, और अकेली अपने दम पर दुनिया में रहना मुश्किल है" 

(फोटो: अरूप मिश्रा/फिट हिंदी)

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गिल्ट, फ्रस्ट्रेशन, डिनायल: दुख के कई चेहरे

हालांकि दुख कभी न कभी हम सभी की जिंदगी में आता है, कुछ स्टिग्मा हैं, जो आज भी दुख से जुड़े हैं. आपको अपना दुख अपने अंदर ही रखना है, इसे दूसरों के सामने व्यक्त नहीं करना है, जल्दी से जल्दी इससे 'बाहर’ आना है.

"मैं वास्तव में उन्हें याद करती हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस तरह की बातचीत हम वयस्कों के रूप में कर सकते हैं. उस बात को अब एक साल हो गया है, इसलिए अब लोगों को लग सकता है कि अगर मैं अभी भी उसके बारे में बात करती हूं, तो यह अजीब है. हमें बस आगे बढ़ना चाहिए अपने जीवन के साथ."
गीता, 57

डॉ रुक्शेदा सायीदा कहती हैं, "दुख एक सामान्य प्रक्रिया है, इसके जरिए हम ठीक होते हैं. ऐसे समय में सबसे अच्छी चीज जो हम खुद के लिए कर सकते हैं वह यह है कि हम खुद को सब कुछ महसूस करने दें. और खुद को रोकने की कोशिश न करें,"

मोहना बैद्य कहती हैं, ''दुख की कोई समय सीमा नहीं होती. हर कोई अपने समय पर ठीक होता है.''

लेकिन अपने आप को वह आजादी देना कुछ लोगों के लिए कठिन हो सकता है.

रुई कहते हैं, "आपको यह भी महसूस होता है कि अगर आप कमजोर दिखेंगी तो लोग आपको जज करेंगे."

"मैं अपनी भावनाओं को बहुत से लोगों से छुपाती थी क्योंकि मुझे नहीं पता था कि वे इसे किस नजर से देखेंगे. हमें हमेशा कहा गया है कि रोना, खुल कर अपनी फीलिंग्स दिखाना, या वल्नरेबल होना एक कमजोरी है."
रुई, 26, शिक्षक

वह आगे कहती हैं कि, "उन भावनाओं को प्रकट करना, जिन्हें हमेशा कमजोरी की निशानी बताया गया है, अत्यंत कठिन था,"

गीता कहती हैं कि उन्होंने अपनी मां की मौत के लिए खुद को भी दोषी ठहराया, हालांकि वास्तव में वह जानती हैं कि वह उसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकती थीं.

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"सभी ने मुझे बताया कि यह जाने का एक अच्छा तरीका था, उसकी दर्द रहित मौत हुई थी. लेकिन एक बच्चे के रूप में आप ऐसा महसूस नहीं करते हैं. मैं गिल्टी महसूस करती हूं, जैसे मुझे और ध्यान देना चाहिए था कि जब उसने झपकी ली और मुझे पता चलना चाहिए था कि कुछ गड़बड़ है. मुझे पता है मैं ऐसा नहीं कर सकती थी, लेकिन मैं अभी भी गिल्टी महसूस करती हूं और मैं इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रही हूं."
गीता, 57

गिल्ट. शर्म. फ्रस्ट्रेशन - जब आप शोक कर रहे होते हैं, तो ऐसी नकारात्मक भावनाएं हावी हो जाती हैं, क्योंकि जब घटनाएं आपके दिमाग में चल रही होती हैं, तो आपको अपने दुख और नुकसान के लिए किसी को दोषी ठहराने की जरूरत होती है, और अक्सर आप खुद हो दोष देते हैं.

"ऐसे में सेल्फ-क्रिटिसिजम और जजमेंट महसूस हो सकता है लेकिन यह केवल हीलिंग की प्रक्रिया को धीमा करता है."
मोहना बैद्य, नैरेटिव थेरेपिस्ट

"मैं गिल्टी फील करती हूं. ऐसा लगता है जैसे परिवार को तोड़ने के लिए मैं जिम्मेदार हूं. मुझे एक खालीपन महसूस होता है," अंबरीन कहती हैं.

"मैं क्रोध, उदासी और हताशा महसूस करती हूं. मुझे दुख होता है कि मेरा परिवार टूट गया. मैं अकेला और डरा हुआ महसूस करती हूं. कभी-कभी मैं बस एक सुरक्षित जगह वापस भागना चाहती हूं, लेकिन तब मुझे एहसास होता है कि मेरे पास कभी ऐसी सुरक्षित जगह नहीं थी, सिर्फ उसका भ्रम था. इसलिए मैं इसे पीछे हटा कर अपने बनाए जीवन का आनंद लेने पर ध्यान केंद्रित करती हूं."
अंबरीन (बदला हुआ नाम)

डॉ रुक्शेदा कहती हैं कि, "सबसे जरूरी है खुद को खुद जैसा रहने दें, और जो कुछ भी महसूस कर रहे हैं उससे दूर न भागें. आप कभी-कभी उदास महसूस करेंगे, और आपको कड़वाहट, या गुस्सा भी महसूस हो सकता है. ऐसे में यह तय करने की कोशिश करना कि आपको कैसा महसूस करना चाहिए बहुत बड़ी गलती होगी जिसका बोझ आपको दुर्बल बना देगा,"

ऐसे में सेल्फ-क्रिटिसिजम और जजमेंट केवल हीलिंग की प्रक्रिया को धीमा करता है.

(फोटो: अरूप मिश्रा/फिट हिंदी)

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दुख पर काबू पाना: हीलिंग सेल्फ-कम्पैशन से शुरू होती है

मोहना कहती हैं कि, "लोगों के पास दुख से निपटने के अपने तरीके होते हैं, और यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि उस समय भावनाओं से निपटने की उनकी क्षमता क्या है,"

अगर आप लॉन्ग-टर्म दुःख या कॉम्प्लेक्स दुःख से गुजर रहे हैं, जिससे आप उबर नहीं पा रहे हैं, तो आपको एक पेशेवर को दिखाने की आवश्यकता हो सकती है, जो दुख को प्रोसेस करने में आपकी सहायता कर सकें.

"मैंने कुछ महीने पहले थेरेपी शुरू की और वह मेरे लिए एक बड़ा कदम था. बहुत लोग इसके खिलाफ थे पर फिर भी मैंने इसे जारी रखा.”

हरलीन ने यह भी बताया कि ग्रैटिट्यूड दिखाने और एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम होने से उन्हें कितनी मदद मिली.

"मेरे पास एक थेरेपिस्ट और एक मनोचिकित्सक हैं. मेरी बहन, कॉलेज की मेरी सबसे अच्छी दोस्त, मेरा पार्टनर और फ्लैटमेट्स में मेरे पास एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम है. मैं भाग्यशाली रही हूं कि मुझे जीवन में कुछ अच्छे लोग मिले. अभी मुझे और बहुत आगे जाना है और मुझे अपने आप पर बहुत गर्व है," वह कहती हैं कि,

"हमें यह भी समझने की आवश्यकता है कि मृत्यु या लॉस एक ट्रॉमा है, और हमारा रिस्पांस ट्रॉमा रिस्पांस है, और सभी का शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म ट्रॉमा रिस्पांस अलग अलग होता है."
डॉ रुक्शेदा सायीदा

याद रखें:

  • कुछ दिन या सप्ताह लें, दुख से उबरने में जल्दबाजी न करें.

  • जितना हो सके सामान्य स्थिति में वापस आएं, लेकिन अगर अचानक आपको किसी स्मृति या भावना का फ्लैश आता है, तो बैठ जाएं और इसे प्रोसेस करने के लिए कुछ समय दें. अपने आप को इसे महसूस करने दें.

  • आप भावनाओं की एक श्रृंखला से गुजरेंगे. लेकिन इससे उबरने का कोई फॉर्मूला नहीं है. आपको कब शोक करना चाहिए या कब बंद करना चाहिए, इस पर कोई निर्धारित पैटर्न, या सीमा नहीं है.

  • अपने आप को आगे बढ़ने दें - इसका मतलब यह नहीं है कि आप उस व्यक्ति की स्मृति को छोड़ रहे हैं, जिसके चले जाने से आपको दुख हो रहा है.

  • उन लोगों को खोजें जिनसे आप खुलकर बात कर सकते हैं, और वल्नरेबल होने का साहस खोजें.

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आपका कोई करीबी दुखी है और आप उसकी मदद करना चाहते हैं, तो पता करें कि उन्हें क्या चाहिए, न कि आपको क्या लगता है कि उन्हें क्या करना चाहिए.

"कभी-कभी अगर सहायता करने की कोशिश करते हुए यह कहते हैं, 'ओह, आपको डरना नहीं चाहिए, चलो काम पर वापस चलते हैं, चलो बाहर चलते हैं', तो सामने वाले को यह बहुत कठोर लग सकता है."

"जरूरी बात यह है कि, हमारा काम यह बताना नहीं है कि दुख से गुजर रहे व्यक्ति को क्या करना चाहिए."
डॉ रुक्शेदा सायीदा

"हमें लोगों को रहने देना चाहिए, लेकिन अगर आपका कोई प्रिय व्यक्ति है, जो आपको पता है कि लंबे समय से दुखी है, तो उनकी मदद करने के लिए सहानुभूतिपूर्ण बनें और उन्हें पेशेवर मदद पाने के लिए प्रोत्साहित करें," डॉ रुक्शेदा कहती हैं.

"एक बार जब आपने किसी को खो दिया है, तो आप भी बदल जाते हैं. अब आपको यह तय करना होगा कि आप कौन बनना चाहते हैं. थोड़े पुनर्विचार की आवश्यकता होगी. जो सही है और स्वस्थ भी है," वह आगे कहती हैं.

"इस बारे में बात न करें कि आप कौन थे, इस बारे में बात करें कि आप आज और कल कौन बनना चाहते हैं. एक बार जब आप ऐसा कर लेते हैं, तो दुख आपको आगे बढ़ने देगा."
डॉ रुक्शेदा सायीदा

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