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राजनीतिक तानाशाही, सामाजिक तानाशाही की तुलना में कुछ भी नहीं है

बाबासाहेब आंबेडकर की एक ही चिंता थी उनका समाज सामाजिक गुलामी से कैसे आजाद होगा

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राजनीतिक तानाशाही, सामाजिक तानाशाही की तुलना में कुछ भी नहीं है
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बाबासाहेब आंबेडकर ने ये बात 1936 में कही थी. ये वो वक्त था जब देश अपनी आजादी के लिए लड़ाई लड़ रहा था. अंग्रेजों का शासन था. मुठ्ठी भर अंग्रेज पूरे देश पर राज कर रहे थे. गांधी जी के नेतृत्व में देश अंग्रेजों की गुलामी को उखाड़ फेंकने में लगा था. सबकी चिंता ये थी कि कैसे देश आजाद हो? पर बाबासाहेब की चिंता कुछ और थी. वो राजनीति में सक्रिय थे पर गांधी जी से अलग एक नये ध्रुव पर खड़े थे. उनकी चिंता ये नहीं थी कि अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति कैसे मिलेगी.उनकी चिंता ये थी कि उनका समाज कैसे सामाजिक गुलामी से आजाद होगा.

सवर्ण जातियों के प्रभुत्व से कैसे उन्हें निजात मिलेगी? कब सवर्ण जातियां उन्हें अपने बराबर मानेंगी और कब वो इंसान समझे जाएंगे? बाबासाहेब के मुंह से निकले ये शब्द उनके अपने अनुभव से निकले थे. विदेश से पढ़कर जब वो बड़ौदा के महाराजा के यहां रक्षा सचिव के तौर पर काम करने लगे तो उनके साथ जो बर्ताव हुआ उससे उनके मन में ये ख्याल आया था कि राजनीतिक स्वतंत्रता मिल भी जाए तो ये महज सत्ता की अदला-बदली होगी. दबा कुचला समाज एक गुलामी से निकल कर दूसरी गुलामी में चला जाएगा.

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डॉ. भीमराव अंबेडकर, सन 1950 में
(फोटो: Wikipedia)

फर्क सिर्फ इतना होगा कि श्वेत अंग्रेजों की जगह अश्वेत भारतीय आ जाएंगे. दलित समाज वैसे का वैसा ही पिसता रहेगा. सदियों का अत्याचार चलता रहेगा. देश तो आजाद हो जाएगा लेकिन उनके समाज पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

...जब सिर पर छत के लिए पहचान छुपाई

बाबासाहेब की इस सोच को पुख्ता करने में उनके जीवन की इस घटना का बड़ा हाथ है. जब वो न्यूयॉर्क से पढ़कर वापस स्वदेश लौटे तो बड़ौदा के राजा के यहां रक्षा सचिव के तौर पर नियुक्त हुये. इतने बड़े पद पर रहने के बाद भी उन्हें बड़ौदा शहर में रहने को जगह नहीं मिली. कोई उनको किराये पर घर देने को तैयार नहीं था. कारण वो सवर्ण जाति के नहीं थे, वो दलित थे.

अंत में उन्हें अपनी पहचान और जाति छिपानी पड़ी, झूठ बोलना पड़ा कि वो पारसी हैं. तब कहीं जाकर उन्हें शहर के बाहर रहने को जगह मिली. पर उनकी पहचान छिप न सकी. लोगों को पता चल गया. उनके घर पर दस-पंद्रह लोगों ने धावा बोल दिया. उनका घर तहस नहस कर दिया. उनका सामान उठाकर बाहर फेंक दिया. वो घर से बेघर हो गये. अपना सामान समेटते वो सड़क किनारे रोते रहे और तब उन्होंने तय किया कि वो सामान्य जीवन नहीं जिएंगे. उन्हें अपने समाज के लिए लड़ना होगा.

उन्हें ये बात समझ में आ गई थी कि जब उन जैसे विदेशों में पढ़े लिखे को सवर्ण समाज बराबरी का दर्जा देने को तैयार नहीं है तो वो जो गरीब हैं, अनपढ़ हैं, हाशिये पर हैं उनके साथ कैसा बर्ताव होता होगा? उन्होंने तय किया कि बिना इस व्यवस्था को बदले काम नहीं चलेगा, दलित समाज को न्याय नहीं मिलेगा. यहीं से शुरू हुआ भीमराव आंबेडकर के बाबासाहेब बनने की कहानी, और जाति प्रथा में जिन्हें  दबा कुचला माना गया यानी जिन्हें शूद्र कहा गया उनके दलित बनने का इतिहास.

बाबासाहेब आंबेडकर के नेतृत्व में दलित चेतना बढ़ने लगी. दलित एकजुट होने लगा. पूरा आंदोलन दलित आंदोलन के नाम से जाना जाने लगा. दलित शब्द दबे कुचले तबके की पहचान हो गया. लेकिन अब इतने सालों के बाद ये कहा जा रहा है दलित शब्द का प्रयोग न हो. मुंबई हाईकोर्ट ने कहा है कि दलितों को दलित न कहा जाए. उन्हें अनुसूचित जाति कह कर पुकारा जाए. देश की सरकार ने मीडिया संस्थानों को ये सलाह दी है कि वे भी दलित की जगह अनुसूचित जाति शब्द का पालन करें.

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दलित समाज को किसी भी नाम से पुकारा जाए

एक सवाल उठ सकता है कि शब्द बदलने से क्या होगा ? दलित समाज को किसी भी नाम से पुकारा जाए, वो रहेंगे तो वही. ये सवाल अच्छा है. अनुसूचित जाति शब्द अंग्रेजों का दिया शब्द है. 1935 में जब गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट आया और उसके तहत दलित समाज को विधायिका में आरक्षण देने का सवाल उठा तो कई निचली जातियों को एक सूची में डालकर कहा गया कि इन्हें आरक्षण के तहत रखा जाए.

इन सूचीबद्ध जातियों को 1937 के कानून में अनुसूचित जाति के नाम से पहचाना गया. बाद में संविधान में भी इस सूची को जस का तस इसी नाम से रखा गया. दबी कुचली जातियों को कानून की नजर में अनुसूचित जाति कह कर पुकारा जाने लगा. पर ये कानूनी नामकरण था. एक टेक्निकल शब्द. व्यवहार में दलित शब्द ही प्रचलन में रहा. इस नाम से दलित पैंथर्स जैसे कई संगठन भी बने. धीरे-धीरे दलित शब्द दबे कुचले समाज की पहचान बन गया. दलित “दलित” कहलाने मे फख्र महसूस करने लगे.

सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण मिलता है और उनकी सामान्य कैटेगरी से अलग अंक तालिका बनती है, जिसका कट ऑफ अंक कम होता है. कई दलित और मेधावी छात्र खुद को अनुसूचित जाति का बताकर लाभ लेने मे अपनी हेठी समझते हैं. वो सामान्य कैटेगरी से ही परीक्षा देते हैं और पास भी करते हैं. पर वो खुद को दलित कहते हैं. इस संदर्भ में अनुसूचित शब्द इस समाज को फायदा तो देता है पर आजीवन उनमें एहसास-ए-कमतरी का कारण भी बनता है. अनुसूचित कैटेगरी से लाभ लेने में जहां संकोच है वहीं दलित शब्द संघर्ष का प्रतीक है. ऐतिहासिक अन्याय से लड़ने की प्रेरणा है.

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ऐसे में सवाल ये पैदा होता है कि दलित शब्द से अगर दलित समाज को ऐतराज नहीं है तो उसको अनुसूचित जाति के नाम से पुकारने का क्या औचित्य है ? सरकार ये तय करने वाली कौन है? सरकार को उलटे कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देनी चाहिये. और अगर उसे ये फैसला लागू ही करना था तो कम से कम दलित नेताओं से सलाह मशविरा कर लेती. समाज की इच्छा जान लेती. हो सकता है वो इस नाम पर सहमति दे देती और न भी देती. कोई समाज किस नाम से अपने को संबोधित किया जाना पसंद करेगा, ये तो उसे ही तय करना चाहिये. यहीं पर ये सवाल बाबासाहेब से आ जुड़ता है.

बाबासाहेब ने 1930 में गोलमेज सम्मेलन के दौरान कहा था कि “तर्क” की जगह “लोगों की सहमति” हमारे संविधान की बुनियाद होनी चाहिये. बाबासाहेब होते तो सरकार के इस फैसले का विरोध करते. वो कहते कि इस फैसले को करते समय उनके समाज की सहमति क्यो नहीं ली गई ? वो कहते कि क्या ये उस मानसिकता का प्रमाण नहीं है जो दलितों को आज भी अपने मन से फैसले करने की इजाजत नही देता है ? उनके फैसले आज भी कोई और करे, ये कहां तक उचित है ? क्या सवर्ण जातियों के संदर्भ में ऐसा कोई फैसला उनकी राय लिये बगैर किया जा सकता है ?  ये भी तो एक तरह की सामाजिक तानाशाही ही तो है जिसका जिक्र बाबासाहेब लगातार करते रहे हैं.
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आजादी के बाद का सच

ये सच है कि आजादी के बाद बने संविधान ने एक झटके में भारतीय समाज में मौजूद गैरबराबरी को खत्म कर दिया. कानून की नजर में सब बराबर हो गये. देश का प्रधानमंत्री हो या सबसे अमीर आदमी, सब कानून के सामने बराबर हैं. सब को एक ही वोट देना होता है और सबके वोट का मूल्य बराबर है. कानून आदमी, आदमी में भेद नही करता. वो एक दृष्टि से देखता है. बाबासाहेब कहते थे कि ये सच है कि संविधान ने दलितों को समानता और स्वतंत्रता प्रदान की. लेकिन वो ये भी कहते थे कि आज भी दलित समाज को सामाजिक तौर पर समान नहीं माना जाता. जाति के आधार पर भेद किया जाता है.

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दलित भी इंसान है. एक ही ईश्वर की संतान हैं. तो ऊंची जातियों और उनमें फर्क क्यों ? इसलिये वो कहते थे कि समानता, स्वतंत्रता के साथ जबतक बंधुत्व यानी “फ्रैटरनिटी” का सिद्दांत नहीं लागू होता तब तक दलितों की सामाजिक न्याय की लड़ाई जारी रहेगी. उनकी लड़ाई आजादी के बाद “सामाजिक समता” की लड़ाई थी. जब उन्हें लगा कि कुछ भी हो जाये हिंदू समाज में उन्हें बराबर नहीं माना जाएगा तो उन्होने बौद्ध होना स्वीकार कर लिया.

उनके जाने के बाद दलित आंदोलन बिखरा भी. नेता कई हुए पर सबको सत्ता ने अपने में समेट लिया. पर कांशीराम ने अलहदा नया प्रयोग किया. दलितों को पहली बार वोट की ताकत का एहसास कराया. यूपी में पहली दलित सरकार बनी.

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आज भी दलित यूपी में एक संगठित ताकत है. 2014 और 2017 के चुनावों में बीजेपी ने दलितों को अपनी तरफ लाने की कोशिश की. मोदी जी ने बार-बार बाबासाहेब का नाम लिया.उनके नाम पर “भीम ऐप” निकाला. ये भी बताया कि कैसे कांग्रेस ने बाबासाहेब का सम्मान नहीं किया. लेकिन उनके प्रधानमंत्री रहते कई ऐसे वाकये भी हुए, जिससे दलित समाज भड़का. ऊना में गो रक्षा के नाम पर दलितों की पिटाई हो या हैदराबाद में रोहित वेमुला की आत्महत्या या फिर भीमा कोरेगांव में हिंसा या यूपी में भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर की गिरफ्तारी जैसी राजनीतिक घटनाओं ने दलितों को झकझोरा है.

उनको लगता है आज भी उनको सवर्ण अपना “बंधु” मानने को राजी नहीं हैं. एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उन्हें हिलाकर रख दिया है. बदले में दलितों ने भारत बंद करके अपने गुस्से का इजहार किया, लेकिन घाव तब और गहरा हो गया जब सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला देने वाले जज को रिटायर होने के बाद ग्रीन ट्राइबयूनल का अध्यक्ष बना दिया गया.

सरकार के एक और फैसले से उनमें खासी नाराजगी है. शिक्षण संस्थानों में पहले संस्थान के स्तर पर दलित कोटे को भरने का प्रावधान था. अब आदेश आया है कि उसे विभागीय स्तर पर लागू किया जाये. इससे कोटे के तहत दलितों की नियुक्ति में पहले से कमी आती है, ऐसा दलितों को लगता है. फिर भीमा कोरेगाव मामले में कट्टर हिंदू संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की जगह नक्सली कहकर उनके शुभचिंतकों की गिरफ्तारी पर भी आक्रोश है.

ऐसे में दलित की जगह अनुसूचित जाति शब्द को प्रयोग में लाने से गलत संदेश जाएगा और इसे भी उसी कैटेगरी में रखकर ये विमर्श बनेगा कि बीजेपी सरकार दलित विरोध पर अड़ी है .और अब वो उसकी पहचान को ही खत्म करना चाहती है. सवाल ये है कि आखिर ऐन चुनाव के वक्त ऐसे फैसले को लागू करने की जरूरत क्या है ? कहीं ऐसा तो नहीं मोदी जी के समानांतर भी कोई धारा किसी कोने में चल रही है.जो उन्हें मजबूत करने की जगह कोई और खेल कर रही है. अब ये तो मोदी जी को ही ज्यादा पता होगा या उन्हें पता करना चाहिये, खैर.

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