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पाक पीएम Vs आर्मी: इमरान खान के खिलाफ चल रहे राजनीतिक खेल का असली खिलाड़ी कौन?

Pakistan में अगर अभी इमरान खान की सत्ता जाती भी है तो इससे नवाज शरीफ के लिए हार-हार वाली स्थिति होगी.

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पाक पीएम Vs आर्मी: इमरान खान के खिलाफ चल रहे राजनीतिक खेल का असली खिलाड़ी कौन?
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पिछले साल के अंत में जब मैं नवाज शरीफ (Nawaz Sharif) से मिली, तो मुझे इस बात का साफ आभास हुआ कि नवाज पाकिस्तान के प्रधान मंत्री इमरान खान (Pakistan PM Imran Khan) को हटाने की जल्दी में नहीं हैं और न ही इमरान को हटाने का उनका मूड है. हालांकि हाइब्रिड शासन की वजह से लोगों को होने वाली पीड़ा के बारे में नवाज काफी चिंतित थे. हालांकि वह मानते हैं कि इमरान एक निर्वाचित नेता नहीं हैं और उनकी सरकार एक सैन्य-स्थापित तंत्र है, बावजूद इसके वह जनरलों के किसी भी जोखिम भरे कार्य को उकसाने के खिलाफ ही दिखे थे.

फिर भी पिछले साल अक्टूबर के बाद से इमरान खान सरकार की जाने की आशंका है, क्योंकि कभी-कभी विपक्ष द्वारा लॉन्ग मार्च का समर्थन किया जाता है और कभी-कभी नेशनल असेंबली में इमरान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए चर्चाएं व गतिविधियां होती हुई दिखती हैं.

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ISI खींचतान

इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के पूर्व चीफ जनरल फैज हमीद के ट्रांसफर और मौजूदा जनरल नदीम अंजुम की नियुक्ति पर सार्वजनिक आक्रोश के बाद यह व्यापक रूप से माना जाता था कि इमरान खान के गिने-चुने दिन रह गए हैं. ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं था क्योंकि एक प्रधानमंत्री आर्मी चीफ के विरोध में था, बल्कि इसलिए कि सेना प्रमुख को इमरान के एकमात्र सहयोगी के रूप में देखा गया था.

इसके अलावा इमरान सरकार ने अर्थव्यवस्था और विदेशी संबंधों को काफी नीचे ला दिया, वहीं बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी पर नियंत्रण न कर पाने की वजह से इमरान की लोकप्रियता में अकल्पनीय गिरावट आई. हालांकि अभी तक इस पर कुछ नहीं हुआ है.

इतना समय क्यों लगा?

ज्यादातर रिपोर्टों के अनुसार इस साल मार्च या अप्रैल में होने वाले चुनावों के साथ दिसंबर 2021 में अविश्वास प्रस्ताव लाया जाना था. सेना प्रमुख जनरल बाजवा (जिनके बारे में माना जाता था कि वह तटस्थ भूमिका में हैं) की मौन स्वीकृति भी इसमें थी. हालांकि बाद में यह सब कुछ काफी लंबा खिंच गया. इस देरी का कारण अपनी कठपुतली सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी देने से पहले कुछ मुद्दों को हल करने की बाजवा की इच्छा माना जाता था.

वे मुद्दे ये हैं :

  • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा निर्धारित मिनी-बजट का पारित होना;

  • पाकिस्तान के स्टेट बैंक को स्वायत्त बनाने के लिए एक विधेयक का पारित होना, जो कि आईएमएफ की मांग भी है;

  • टेथियन कॉपर कंपनी (TTC) के साथ रेको डिक सौदे को अंतिम रूप देना, जिस पर 2019 में वर्ल्ड बैंक से संबंधित न्यायाधिकरण इंटरनेशनल सेंटर फॉर सेटलमेंट ऑफ इंवेस्टमेंट डिस्प्यूट्स (ICSID) ने 6 बिलियन यानी लगभग 600 करोड़ अमेरिकी डॉलर का हर्जाना ठाेका था.

बिल पास हो गए, लेकिन टीटीसी समझौते की कोई खबर नहीं आई, जिस पर अभी हस्ताक्षर होना बाकी है. इसलिए, चाहे जनरल विपक्ष के साथ खेल खेल रहे हों या नहीं, नवाज उनके (जनरल के) साथ पर्दे के पीछे से खेलने से इनकार करते आए हैं. इसके बावजूद भी पाकिस्तानी मीडिया में अविश्वास की बात बनी हुई है, ऐसी खबरें लीक हुईं कि इमरान खान को हटाने के लिए पाकिस्तान मुस्लिम लीग (N) (PMLN) के सुप्रीमो नवाज शरीफ को सहमत करने के लिए लंदन दूत भेजे गए.

पीएमएलएन के वरिष्ठ सदस्यों के अलावा, जनरल बाजवा के एक करीबी रिश्तेदार को प्रमुख दूत या संदेशवाहक कहा जाता है, जो जनरल के साथ समझौता करने के खिलाफ नहीं हैं. स्पष्ट रूप से, बातचीत से उस तरह के परिणाम प्रदान नहीं किए हैं जिसके फलस्वरूप अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सके.
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नवाज शरीफ की एंट्री

पूर्व राष्ट्रपति जरदारी और बिलावल भुट्टो अप्रत्याशित रूप से फरवरी की शुरुआत में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए शाहबाज शरीफ के घर लंच पर पहुंचे. यह मौका पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) और पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएलएन) के बीच उस कड़वे अनुभव के एक साल बाद आया, जब पीपीपी ने लोकतंत्र को बहाल करने के लिए सभी विपक्षी दलों को साथ लेकर बनाए गठबंधन पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (PDM) को छोड़ दिया था या उसे निष्कासित कर दिया गया था.

शाहबाज शरीफ के घर पर हुई मीटिंग में मरियम नवाज की उपस्थिति ने इस बात के संकेत दिए कि नवाज शरीफ भी इस प्रस्ताव पर चर्चा के लिए सहमत लगते हैं. इसके बाद विपक्षी दलों द्वारा तीव्र गतिविधि देखने को मिली. इस बैठक के बाद एक के बाद एक मीटिंग हुईं. पहले विपक्षी दलों की हुई फिर विपक्ष और सरकार के गठबंधन सहयोगियों के बीच.

इसने अफवाहों को हवा दी कि इमरान खान के खिलाफ बाजवा के अविश्वास प्रस्ताव की योजना में शामिल होने के लिए नवाज शरीफ आखिरकार पार्टी के दबाव में झुक गए थे.

ऐसा कहा जाता है कि पीएमएलएन नेताओं ने नवाज को मनाने के लिए दो प्रमुख तर्क दिए थे: पहला, जनता का दबाव और दूसरा, इमरान खान द्वारा पूर्व आईएसआई ISI प्रमुख फैज हमीद को नया सेना प्रमुख चुनने की सनक. जनरल बाजवा इसी साल नवंबर में रिटायर होने वाले हैं.

इससे ऐसा प्रतीत होता है कि नवाज शरीफ ने अपने भाई और उनके साथियों को पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के भीतर सरकारी गठबंधन सहयोगियों और फॉरवर्ड ब्लॉक्स के साथ जोड़ तोड़ करने की अनुमति देदे दी है. जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि अविश्वास प्रस्ताव जनरल बाजवा के दिमाग की उपज है. वह इमरान को बाहर करना चाहते हैं लेकिन उनकी मंशा है कि ये 'गंदा काम' कोई राजनेता करे. उनके पास और भी कई विकल्प हैं, लेकिन वह चाहते हैं कि विपक्ष के हाथों ही यह सब हो, वही इसका ब्लेम भी ले. इसके साथ सभी को उनकी यह इच्छा पता है, कि वे कभी नहीं चाहेंगे, नवाज शरीफ आम चुनाव में बहुमत पाकर फिर से सत्ता हासिल करें, और उनको इस प्रधानमंत्री के कार्यकाल में सेना प्रमुख की जिम्मेदारी निभाना पड़े.

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शरीफ के लिए लगभग लॉस-लॉस सिचुएशन

बेशक, शरीफ इस खतरे से अवगत हैं. वहीं इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि इमरान को हटाने के बाद पाकिस्तान में आम चुनाव होगा. इमरान को हटाए जाने से सदन की प्रकृति पर कोई असर नहीं पड़ेगा और वह बाजवा की हेराफेरी का शिकार होता ही रहेगा. अगर बाजवा पीटीआई और पीपीपी की सरकार को एक साथ जोड़ लेते हैं. उदाहरण के लिए मौजूदा असेंबलियों के बाकी कार्यकाल के लिए ही जोड़ते हैं तो अविश्वास मत शरीफ के लिए एक बहुत ही खराब लॉस-लॉस सिचुएशन बन सकता है. नवाज शरीफ लोकतंत्र के समर्थन में नैरेटिव देते रहे हैं कि "वोट को इज्जत दो". इस असंभावित स्थिति में नवाज न केवल नैतिक उच्च आधार वाले अपने इस नेरेटिव को खो देंगे, बल्कि वह उस आम चुनाव से भी चूक जाएंगे जिसकी उन्हें लालसा है.

अब जब इमरान सरकार का कार्यकाल वैसे भी डेढ़ साल में समाप्त हो रहा है तो वह इस प्रस्ताव परपर क्यों सहमत हों?

नवाज शरीफ वर्तमान के इन समीकरणों का दिखावा तब तक जारी रख सकते हैं जब तक कि उन्हें कोई बड़ा पुश न मिल जाए. इसके बाद वे अपने भाई शाहबाज शरीफ और बाकियों से हाथ खींच सकते हैं. थोड़े समय के लिए अपने भाई की बात का समर्थन करने और उसे बहलाने का उन्हें कुछ तो फायदा मिल सकता है. हो सकता है इमरान को अपने विरोधियों के इस जुड़ाव से कई डरावने सपने आएं, और वे सदन से निकाले जाने की बदनामी के डर से असेंबली को भंग करने जैसे गलत कदम उठा लें. इसके साथ ही एक निष्पक्ष चेहरे बनाकरबनाकर समय को धोखा देने जैसी स्ट्रेटजी का अतिरिक्त फायदा भी है. यह खिलाड़ी को उसके अपने ही खेल में उलझाने जैसा है.

(गुल बुखारी, यह पाकिस्तानी पत्रकार और अधिकारों के लिए काम करने वाली एक्टिविस्ट हैं. ये ट्विटर पर @GulBukhari से ट्वीट करती हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट न तो इसका समर्थन करता है और न ही इसके लिए जिम्मेदार है.)

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