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नवंबर तक मुफ्त अनाज, मोदी का ये ऐलान किस ओर कर रहा है इशारा

अनलॉक 1.0 के एक महीने बाद केंद्र सरकार ने महसूस किया है कि आर्थिक सुधार की गति उम्मीद के अनुरूप नहीं है

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मंगलवार 30 जून को राष्ट्र के नाम संबोधन में पीएम ने चीन से तनाव का जिक्र तक नहीं किया. वहीं जब उन्होंने गरीबों की स्थिति में सुधार के लिए ऐलान किए तो साथ में भी स्वीकार कर लिया कि सरकार लॉकडाउन के कारण जिनकी नौकरियां गई हैं, उनको रोजगार देने और इकनॉमी की स्थिति को ठीक करने में नाकाम रही है.

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यह इस बात का भी संकेत है कि सरकार के पास आगे के लिए कोई स्पष्ट योजना नहीं है. इसके बजाए जो चीजें जैसे सामने आ रही हैं, उसके हिसाब से प्रतिक्रिया दे रही है.

मुफ्त अनाज योजना के विस्तार का मतलब

अनलॉक 1.0 के एक महीने बाद केंद्र सरकार ने महसूस किया है कि आर्थिक सुधार की गति उम्मीद के अनुरूप नहीं है. मुफ्त अनाज योजना का विस्तार नवंबर तक करने से यही पता चलता है. योजना का नाम प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना है. इस कार्यक्रम के तहत जो मुफ्त गेहूं और दाल दिया जा रहा है, वह राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा कानून के तहत है. इसे उसी यूपीए सरकार ने पास किया था, जिसमें बीजेपी को सिर्फ खामियां ही नजर आती हैं.

मोदी की यह घोषणा मार्च 2020 में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से तीन महीने लिए की गयी घोषणा का ही अगले पांच महीने तक के लिए यानी नवंबर के आखिर तक विस्तार है. आम तौर पर सरकारी योजनाएं तिमाही आधार पर बढ़ाई जाती हैं.

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त्योहारी सीजन' तक मुफ्त अनाज

उन्होंने कई हिन्दू त्योहारों का जिक्र किया लेकिन बकरीद, मोहर्रम और गुरु नानक जयंती का उल्लेख करना भूल गए जो इसी अवधि में पड़ेंगे. बहुधर्मी राष्ट्र में इस अनदेखी से मोदी पर यह आरोप लग सकता है कि उनका नजरिया विभिन्न आस्थाओं से जुड़े त्योहार के मामले में ‘एकतरफा’ हैं.

गौरतलब है कि पांच महीने की इस अवधि का अंत बिहार में विधानसभा चुनाव के खत्म होने, उसके नतीजे आने और नयी सरकार के बनने के बाद होगा. वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 27 नवंबर को खत्म हो रहा है. विपक्षी पार्टियां निश्चित रूप से चुनाव से जोड़कर इसका मतलब निकालेंगी.

  • अनलॉक 1.0 के एक महीने बाद केंद्र सरकार ने महसूस किया कि आर्थिक सुधार की गति उम्मीद के अनुरूप नहीं है.
  • नवंबर तक मुफ्त अनाज योजना, जिसका नाम प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना है, का विस्तार यही बताता है.
  • प्रधानमंत्री ने बीजिंग के साथ सैन्य गतिरोध और राजनयिक बातचीत पर चुप्पी बनाए रखी है और लोगों को विश्वास में लेने से परहेज करना जारी रखा है.
  • स्वभाव से अलग मोदी ने इस संबोधन में उन कदमों के बारे में बताया जो सरकार ने गरीबों को राहत देने के लिए उठाए हैं.
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चीन पर सफाई की उम्मीदों को झटका

आखिरकार यह कोई दुर्घटना नहीं थी जब मोदी के भाषण के बमुश्किल घंटे भर बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री की मुफ्त अनाज योजना की घोषणा से दो कदम आगे बढ़कर एलान कर डाला. उन्होंने घोषणा की कि जून 2021 तक गरीबों को मुफ्त राशन मिलेगा. उसी समय राज्य में चुनाव खत्म होंगे. मोदी को उनके ही खेल में पीछे छोड़ देने का ऐसा उदाहरण कम मिलता है.

सीएम ममता बनर्जी ने चीन के साथ परिस्थिति को सही तरीके से हैंडल नहीं कर पाने का आरोप भी सरकार पर लगाया. उनका मानना था कि “कुछ एप्स पर प्रतिबंध लगाने से कोई नतीजा नहीं निकलेगा, हम चीन को उचित जवाब देना चाहते हैं"

मोदी के लिए यह आलोचनात्मक टिप्पणी परेशानी का सबब हो सकती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया पर मोदी और उनकी पार्टी के साथियों के पुराने वीडियो घूम रहे हैं, जिसमें वे मनमोहन सिंह सरकार की आलोचना करते दिखते हैं कि वो एलएसी के मुद्दे को ठीक से डील नहीं कर पाई.

जब पीएमओ ने 29 जून की देर शाम यह घोषणा की कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आम लोगों के सामने आएंगे और राष्ट्र के नाम संबोधन होगा, तो उसके बाद अटकलें स्वाभाविक रूप से तेज हो गयीं.

यह घोषणा टिकटॉक और 58 अन्य चीनी एप्स पर प्रतिबंध के बमुश्किल एक घंटे बाद हुई. इस वजह से उम्मीदें बढ़ गयीं कि मोदी इस अवसर का इस्तेमाल कई मुद्दों पर स्थिति स्पष्ट करने के लिए करेंगे, जो गलवान घाटी में भारतीय और चीनी जवानों के बीच हुई खूनी हिंसक झड़प के बाद पैदा हुई हैं.

किस बात पर रहा मोदी के भाषण का जोर?

प्रधानमंत्री ने सैन्य गतिरोध और बीजिंग के साथ राजनयिक बातचीत पर चुप्पी बनाए रखी और लोगों को विश्वास में लेने से परहेज जारी रखा. शायद इसलिए कि वे अपनी ‘मजबूत’ नेता वाली छवि पर ‘दाग’ लगने नहीं देना चाहते थे.

चीन के बारे में एक शब्द नहीं बोलने का मोदी का फैसला और असामान्य तरीके से भाषण को छोटा रखने (महज 16 मिनट) की वजह से इस संबोधन की आवश्यकता को लेकर सवाल उठ रहे हैं. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि केंद्र सरकार ने मोदी के भाषण से काफी पहले ही लॉकडाउन को लेकर गाइडलाइन जारी कर दी थी.

वास्तव में एकमात्र प्रासंगिक मुद्दा था जिसे मोदी ने अपने संबोधन में उठाया. उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के दौरान “हम बहुत सावधान थे मास्क पहनने को लेकर, सामाजिक दूरी और हर 20 सेकेंड्स पर हाथ धोने को लेकर.” अब इन सावधानियों को छोड़ दिया गया है और “अब व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहार में लापरवाही बढ़ रही है.”

मोदी ने राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासनिक संस्थानों की भी इस बात के लिए खिंचाई की कि वे केंद्र की ओर से जारी निर्देशों और नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। उन्होंने ऐसी संस्थाओं को कहा, “वैसी ही सतर्कता (लॉकडाउन के दौरान वाली) दिखाएं”।

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कोविड के बीच सरकार के कदमों को दोहराने की जरूरत पीएम को क्यों पड़ी?

संबोधन में ये बताने का सचेत प्रयास दिखा कि सरकार ने आम लोगों का दुख कम करने के लिए क्या-क्या किया? अपने संक्षिप्त भाषण का बड़ा हिस्सा उन्होंने सरकार की ओर से अब तक उठाए गये कदमों को बताने में लगाया और ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना’ के तहत योजनाओं के विस्तार से ब्योरा रखा.

इनमें से ज्यादातर नियमित या पूर्व घोषित कार्यक्रम का हिस्सा थे. उदाहरण के लिए मोदी ने बताया कि जब से लॉकडाउन लागू हुआ है, “18 हजार करोड़ की राशि 9 करोड़ से ज्यादा किसानों के बैंक अकाउंट में जमा कराए गये हैं.” बहरहाल उन्होंने इस बात का जिक्र नहीं किया कि यह रकम प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत किसानों को दिए गये और यह राशि तब भी लाभुकों के खाते में जाती, अगर महामारी ने जीवन और अर्थव्यवस्था को तबाह नहीं किया होता.

कोविड-19 महामारी के प्रबंधन के मुद्दे पर प्रधानमंत्री भारत की स्थिति की तुलना दूसरे देशों से करने तक सीमित रहे.

एक ऐसे समय में जब भारत में नाटकीय रूप से कोविड के मामले बढ़ रहे हैं, मोदी ने कम मृत्यु दर की ओट लेना जारी रखा. यह तर्क कि हम मुश्किल स्थिति में हैं लेकिन परिस्थिति और भी बुरी होती अगर समय पर लॉकडाउन नहीं होता, वास्तव में विनाशकारी जीत के भाव से अलग नहीं है. और, निश्चित रूप से इससे बचा जाना चाहिए था.

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